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लोकदेवता देवलसमेत का डोला उठा

Fri, 22 Apr 2016 10:51 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, पिथौरागढ़
ब्यूरो/अमर उजाला, पिथौरागढ़ Updated Fri, 22 Apr 2016 10:51 PM IST
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Lokdewata Devlsmet lift the stretcher
डोला उठा - फोटो : अमर उजाला

सोरघाटी के 22 गांवों में चैतोल का पर्व शुक्रवार को पूरी आस्था और उल्लास के साथ संपन्न हो गया। परंपरा के अनुसार घंटाकरण में डोलों का मिलन हुआ। देवडांगरों ने लोगों को आशीर्वाद दिया। लोगों ने लोकदेवता को प्रसन्न करने के लिए फूल और अक्षत से पूजन किया। मान्यता है कि लोकदेवता देवलसमेत बाबा अपनी 22 बहनों को भिटोली देने के लिए जाते हैं। सदियों से चली आ रही इस परंपरा को लोग उत्सव के रूप में मनाते हैं। देवलसमेत बाबा की छतरी को भिटोली के प्रतीक स्वरूप सभी गांवों में घुमाई जाती है। इससे पहले छतरी और डोलों का विधिविधान से पूजन हुआ। उसके बाद देवडांगर किशन सिंह महर और दीवान सिंह महर डोलों में सवार हुए तो पूरा माहौल देवलसमेत बाबा की जयकारों से गूंज उठा।

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देवलसमेत बाबा को शिव रूप में पूजा जाता है। सेरादेवल में विख्यात मंदिर है। शुक्रवार को देवलसमेत बाबा की छतरी विण, देवलालगांव, मखोलियागांव, दौला, बस्ते, देवकटिया, ओड़माथा, नैनीसैनी, कासनी, कुसौली, कोटली, सुजाई, खतेड़ा, सेरादेवल, तपस्यूड़ा मंदिर, जाखनी, कुमौड़, लुंठ्यूड़ा आदि स्थानों पर घूमी, जबकि डोले को जाखनी और चैंसर से लाया गया। यह सिल्थाम से मुख्य सड़क से होते हुए घंटाकरण के शिव मंदिर तक पहुंचा। वहां पर लुंठ्यूड़ा से आने वाले डोले से मिलन हुआ। मिलन के बाद डोलों को विसर्जन के लिए ले जाया गया। इस लोकपर्व को देखने के लिए सैकड़ों की संख्या में लोग मौजूद थे। सोरघाटी के सभी 22 गांवों में चैतोल के मौके पर आस्था और उल्लास का माहौल रहा। घंटाकरण मंदिर के पास डोलों के मिलन को देखने के लिए भारी संख्या में लोग मौजूद रहे। 

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