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यक्षवती नदी को पुनर्जीवित और संरक्षित करने के दावे हवाई
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पिथौरागढ़। रई गाड़ (यक्षवती नदी) को संरक्षित और पुनर्जीवित करने के दावे हवाई साबित हो रहे हैं। यहां हर वर्ष एक विशेष दिन हरेले पर नदी किनारे बड़ी संख्या में पौधों का रोपण कर सफाई अभियान चलाया जाता है। फिर इस नदी को संरक्षित करने की याद अगले वर्ष सिर्फ हरेला पर्व पर ही आती है। शासन-प्रशासन की अनदेखी के कारण यक्षावती नदी पूरी तरह दूषित हो चुकी है। लोगों ने घरों के गंदे नाले यक्षवती नदी में डाले हैं। उद्गम स्थल से कुछ दूरी तक यक्षावती शुद्ध और साफ है लेकिन आबादी वाले क्षेत्रों में पहुंचते ही नदी दूषित हो जाती है।
वर्ष 2018 में तत्कालीन डीएम डॉ. रंजीत सिन्हा ने यक्षवती नदी के संरक्षण की पहल शुरू की थी। इसमें वर्ष 2018 में वन विभाग सहित नौ अन्य विभागों ने नदी के पानी को बढ़ाने के लिए उद्गम स्थल मड़ सिलौली सहित 10 हेक्टेयर भूमि पर पौधरोपण था। दो साल बाद आज कई पौधे देखरेख के अभाव में सूख चुके हैं। 2019, 2020, 2021 में भी नदी को संरक्षित और पानी बढ़ाने के उद्देश्य से हजारों पौधों का रोपण किया गया लेकिन देखरेख के अभाव में कुछ ही पौधे जीवित बचे हैं। मड़खड़ायत, मड़ सिलौली, जीबी गांव में यक्षवती नदी साफ है, लेकिन एआरटीओ ऑफिस पहुंचने के बाद यह नदी प्रदूषित होती जा रही है। आलम यह है लोगों ने सीवर लाइन यक्षवती नदी में डाले हैं जिससे नदी का पानी दूषित हो रहा है। पालिका भी सीवरेज डालने वालों पर कार्रवाई का दावा तो करती है लेकिन कुछ नहीं हुआ। इसके साथ ही रई यक्षवती नदी क्षेत्र के आसपास कई लोगों ने अतिक्रमण किया है।
सेना की भूमि होने के कारण नहीं बन पाया मिनी डैम
पिथौरागढ़। यक्षवती नदी में वर्ष 2016 में सिंचाई विभाग को मिनी डैम, जल संवर्धन, संरक्षण, पेयजल के लिए शासन से एक करोड़ छियालिस लाख रुपये की स्वीकृति मिली थी। सेना की जमीन होने के कारण यहां पर मिनी डैम नहीं बन पाया। मजबूरन सिंचाई विभाग को धन शासन को लौटाना पड़ा।
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स्कंद पुराण में है यक्षवती नदी का उल्लेख
पिथौरागढ़। पर्यावरणविद मनोज मटवाल (डफाली) ने बताया कि यक्षवती नदी का उल्लेख स्कंदपुराण में है। नगर के मध्य में बहने वाली रईगाड़ से ‘ठुलिगाड़’ को ‘यक्षवती’ नदी कहा गया है। यक्षवती नदी ‘असुर’ प्रांत से निकलती थी। आज भी ठुलिगाड़ के उद्गम के पास दो ऊंचे ‘असुरचुल’ नाम के पहाड़ हैं। यहां लोक देवता ‘असुर’ की स्थापना है। यहां पर कई धार्मिक आयोजन होते हैं।
नमामि गंगे अभियान के तहत रई नदी को साफ किया जाएगा। इसके लिए आईटीबीपी को भी निर्देशित किया गया है। - डॉ. आशीष चौहान, डीएम, पिथौरागढ़।
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वर्ष 2018 में तत्कालीन डीएम डॉ. रंजीत सिन्हा ने यक्षवती नदी के संरक्षण की पहल शुरू की थी। इसमें वर्ष 2018 में वन विभाग सहित नौ अन्य विभागों ने नदी के पानी को बढ़ाने के लिए उद्गम स्थल मड़ सिलौली सहित 10 हेक्टेयर भूमि पर पौधरोपण था। दो साल बाद आज कई पौधे देखरेख के अभाव में सूख चुके हैं। 2019, 2020, 2021 में भी नदी को संरक्षित और पानी बढ़ाने के उद्देश्य से हजारों पौधों का रोपण किया गया लेकिन देखरेख के अभाव में कुछ ही पौधे जीवित बचे हैं। मड़खड़ायत, मड़ सिलौली, जीबी गांव में यक्षवती नदी साफ है, लेकिन एआरटीओ ऑफिस पहुंचने के बाद यह नदी प्रदूषित होती जा रही है। आलम यह है लोगों ने सीवर लाइन यक्षवती नदी में डाले हैं जिससे नदी का पानी दूषित हो रहा है। पालिका भी सीवरेज डालने वालों पर कार्रवाई का दावा तो करती है लेकिन कुछ नहीं हुआ। इसके साथ ही रई यक्षवती नदी क्षेत्र के आसपास कई लोगों ने अतिक्रमण किया है।
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सेना की भूमि होने के कारण नहीं बन पाया मिनी डैम
पिथौरागढ़। यक्षवती नदी में वर्ष 2016 में सिंचाई विभाग को मिनी डैम, जल संवर्धन, संरक्षण, पेयजल के लिए शासन से एक करोड़ छियालिस लाख रुपये की स्वीकृति मिली थी। सेना की जमीन होने के कारण यहां पर मिनी डैम नहीं बन पाया। मजबूरन सिंचाई विभाग को धन शासन को लौटाना पड़ा।
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स्कंद पुराण में है यक्षवती नदी का उल्लेख
पिथौरागढ़। पर्यावरणविद मनोज मटवाल (डफाली) ने बताया कि यक्षवती नदी का उल्लेख स्कंदपुराण में है। नगर के मध्य में बहने वाली रईगाड़ से ‘ठुलिगाड़’ को ‘यक्षवती’ नदी कहा गया है। यक्षवती नदी ‘असुर’ प्रांत से निकलती थी। आज भी ठुलिगाड़ के उद्गम के पास दो ऊंचे ‘असुरचुल’ नाम के पहाड़ हैं। यहां लोक देवता ‘असुर’ की स्थापना है। यहां पर कई धार्मिक आयोजन होते हैं।
नमामि गंगे अभियान के तहत रई नदी को साफ किया जाएगा। इसके लिए आईटीबीपी को भी निर्देशित किया गया है। - डॉ. आशीष चौहान, डीएम, पिथौरागढ़।