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पिथौरागढ़: जान जोखिम में डालकर सफर कर रही हजारों की आबादी, लकड़ी की सीढ़ी के सहारे चढ़ रहे पहाड़ी

Sun, 12 Jun 2022 12:45 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, पिथौरागढ़
संवाद न्यूज एजेंसी, पिथौरागढ़ Published by: हल्द्वानी ब्यूरो Updated Sun, 12 Jun 2022 12:45 PM IST
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Kumauni Sammelan in Pithauragarh
बंगापानी तहसील के ढुना मानी गांव जाने के लिए लकड़ी की सीढ़ी से पहाड़ी की ओर जाता ग्रामीण। संवाद - फोटो : PITHORAGARH

कई देशों ने समुद्र में शहर बसा लिए गए हैं। ऐसी भी तकनीक है जिससे कुछ ही घंटों में 100 मीटर तक लंबे बेली ब्रिज तैयार कर उसके ऊपर से भारी भरकर वाहन गुजरने लगते हैं लेकिन पिथौरागढ़ जिले के बंगापानी क्षेत्र के कई गांव ऐसे हैं जहां के लिए न रास्ते और न ही पुल हैं। इन गांवों की हजारों की आबादी की जिंदगी आधुनिक विज्ञान की नहीं बल्कि आदम के जमाने की तकनीक के सहारे चलती है।

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बंगापानी तहसील का अधिकतर क्षेत्र आपदा प्रभावित है। इस तहसील के नदी घाटी क्षेत्रों के संपन्न गांवों को गोरी नदी ने पूरी तरह से उजाड़ बना दिया है। वर्ष 2013 की आपदा में गोरी नदी के किनारे बसे तल्ला घरुड़ी, मल्ला घरुड़ी, ढूना-मानी से लेकर भदेली सहित कई गांवों के मकान, जमीन, झूला पुल और रास्ते भी बह गए थे। तब से इन गांवों की व्यवस्था बहाल नहीं हो सकी है।
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आपदा के बाद से तल्ला और मल्ला घरुड़ी के लिए पुल नहीं बनाया जा सका है। इस गांव के लिए अब केवल एक ट्रॉली ही आवाजाही का एकमात्र साधन है, बरसात शुरू होते ही नदी का जल स्तर बढ़ने से ट्रॉली भी नदी में समा जाती है। इसके बाद इस गांव के 30 से अधिक परिवारों को शेष दुनिया से अलग-थलग रहना पड़ता है।

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इसी तहसील के ढुना-मानी गांव को जाने वाला रास्ता दो साल पूर्व आपदा के दौरान गोरी नदी में समा गया था, तब से इस गांव तक जाने के लिए रास्ता नहीं बन पाया है। जरूरी कामकाज के लिए फगुवा या फिर बंगापानी आने वाले यहां के लोग लकड़ी की सीढ़ी के सहारे पहाड़ी चढ़कर गांव तक पहुंचते हैं।

 

यह इतना खतरनाक है कि थोड़ा सा संतुलन बिगड़ा तो सीधे उफनाई गोरी नदी में गिरने का खतरा रहता है, लेकिन मजबूरी के कारण जान जोखिम में डालकर आवाजाही करना इस गांव के लोगों की जिंदगी का हिस्सा बन गया है, क्योंकि गांव तक पहुंचने के लिए ग्रामीणों को मदकोट होकर जाना पड़ता है जिसमें छह किमी की दूरी तय करनी पड़ती है।

 

स्थानीय कैलाश सिंह, चंद्र शेखर, महेंद्र सिंह, दुर्गा सिंह ने बताया कि रास्ता न बनने से तमाम परेशानियों का सामना करना पड़ता है। बच्चों, महिलाओं या बुजुर्गों के लिए इस रास्ते चल पाना मुश्किल होता है। यही हाल वर्ष 2020 की आपदा में बरबाद हुए टांगा गांव का भी है। आपदा में 11 लोगों को खोने वाले इस गांव तक जाने के लिए भी पुल नहीं है। आज भी लोग जंग लगी ट्रॉली के सहारे गांव तक पहुंचते हैं।


पुल न होने से हर साल होती हैं मौतें
पिथौरागढ़। जिले की गोरी नदी, धौली गंगा, चर्मा नदी, गुरजी गाड़, राम गंगा सहित कई अन्य छोटी नदियों में बसासत वाले स्थानों पर पुलों के निर्माण की जरूरत है। बरसात में नदियों का जल स्तर ही नहीं बढ़ता बल्कि गाड़-गधेरे भी उफान पर आ जाते हैं। ग्रामीणों को नदी से ही आवाजाही करनी पड़ती है, ऐसे में नदियां लोगों को अपने साथ बहा ले जाती हैं। मुनस्यारी के मल्ला जोहार क्षेत्र को जाने के लिए लोगों को लकड़ियों के अस्थायी पुलों से होकर गुजरना पड़ता है। हर साल गाड़-गधेरों और नदियों में असुरक्षित आवाजाही करने के दौरान कई लोग मौत के मुंह में चले जाते हैं।

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