ज्योलिंगकांग तक सड़क निर्माण की गति बेहद धीमी
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सामरिक महत्व की गुंजी-कुटी-ज्योलिंगकांग सड़क निर्माण की गति बेहद धीमी है। इसकी धीमी गति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 2001 में गुंजी से कुटी होते हुए ज्योलिंगकांग तक रोड बनाने का प्रस्ताव बना था और सीमा सड़क संगठन ने 2010 में इस सड़क के निर्माण का काम शुरू किया। पिछले 6 सालों में 27 किमी प्रस्तावित यह सड़क गुंजी से नंफा तक मात्र 10 किमी ही बन पाई है, जबकि नंफा से कुटी तक आठ किमी और कुटी से ज्योलिंगकांग तक 9 किमी (कुल 17 किमी) सड़क का निर्माण होना अभी बाकी है। यह सड़क पूरी बन जाए तो आदि कैलास यात्रियों को काफी सुविधा होगी। तब उन्हें ज्योलिंगकांग तक वाहन सुविधा मिल जाएगी और ज्योलिंगकांग से उन्हें सिर्फ 1 किमी ही पैदल चलकर आदि कैलास के दर्शन हो जाएंगे। इसके साथ ही तिब्बत सीमा पर स्थित अंतिम भारतीय गांव कुटी भी सड़क से जुड़ जाएगा।
बता दें कि आदि कैलास यात्रियों को अभी गर्बाधार से आदि कैलास तक 60 किमी पैदल चलना पड़ता है। वे धारचूला से गर्बाधार तक 35 किमी वाहनों में आते हैं। गर्बाधार से कुटी 50 किमी, कुटी से ज्योलिंगकांग 9 किमी और ज्योलिंगकांग से आदि कैलास एक किमी है। जिला पंचायत सदस्य मंजुला बुदियाल और कुटी की प्रधान सरिता देवी बताती हैं कि सामरिक महत्व की इस सड़क को शीघ्र बनाने के लिए सरकार को कई बार पत्र लिखा गया, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।
कुटी और नाभी के नाम से धारचूला में स्कूल
कुटी एक माइग्रेशन गांव है। यहां रहने के दौरान उनकी परेशानियों का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्हें डाक संबंधी किसी कार्य के लिए 18 किमी पैदल गुंजी आना पड़ता है। यहां के लोग शीतकाल में गांव छोड़कर धारचूला या अन्यत्र चले जाते हैं। इसी तरह नाभी गांव के लोग भी सर्दियों में धारचूला या अन्य जगहों पर चले जाते हैं। इस दौरान दोनों गांवों के प्राथमिक स्कूलों का संचालन भी धारचूला में होता है। इससे बच्चोें की पढ़ाई बहुत प्रभावित होती है। नाभी और कुटी के नाम से ही धारचूला में इन स्कूलों का संचालन होता है।