{"_id":"59f9fde24f1c1bce538ba609","slug":"if-the-rains-happen-the-farm-will-be-inhabited-varna-barren","type":"story","status":"publish","title_hn":"बारिश हुई तो खेत आबाद होंगे, वर्ना बंजर","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
बारिश हुई तो खेत आबाद होंगे, वर्ना बंजर
ब्यूरो/अमर उजाला, थल
Updated Wed, 01 Nov 2017 10:31 PM IST
विज्ञापन
थल के अमतड़ गांव में पानी के बिना सूखे खेत
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
थल तहसील के अंतर्गत हत्वालगांव ग्राम पंचायत के अमतड़ गांव के लोग 15 वर्ष से सिंचाई नहर की मांग कर रहे हैं, लेकिन पहाड़ की खेती को बढ़ावा देने की बात करने वाली सरकार अब तक नहर का निर्माण नहीं कर पाई है, जबकि गांव से 500 मीटर की दूरी पर गोरघटिया नदी बहती है। सिंचाई के अभाव में 15 वर्ष से गांव के लोग 45 हेक्टेयर जमीन को एक सीजन में बंजर छोड़ देते हैं। इस बार भी लोगों ने खेत जोतकर छोड़ रखे हैं। यदि समय पर बारिश हो जाए तो गेहूं और मसूर की बुआई कर लेंगे, वर्ना खेत बंजर रह जाएंगे।
विज्ञापन
अमतड़ गांव में पहले 30 परिवार रहते थे। राज्य गठन के बाद पांच परिवार गांव छोड़कर चले गए। सब्जी और फसल उत्पादन से आजीविका चलाने वाले गांव के लोगों ने राज्य गठन के बाद सिर्फ नहर की मांग की थी। गांव के लोग बताते हैं कि न तो किसी जनप्रतिनिधि ने और न किसी अधिकारी ने उनकी बात सुनी। पहले समय पर बारिश होती थी तो लोग जमीन में दो-दो खेती कर लेते थे।
विज्ञापन
हाल के वर्षों में मौसम में आए बदलाव का असर खेती पर भी पड़ा है। लोगों का कहना है कि यदि सिंचाई नहर बन जाती तो फसल का उत्पादन बढ़ जाता और अनाज का अच्छा उत्पादन होने लगता, पर सरकार कब नहर बनाएगी कहा नहीं जा सकता। लिहाजा, गांव के कुछ संपन्न परिवार गांव छोड़ने की तैयारी में हैं।
विज्ञापन
राज्य बनने का कोई लाभ नहीं हुआ
अमतड़ निवासी कमला देवी का कहना है कि राज्य बनने का गांवों को कोई लाभ नहीं हुआ। सिर्फ शहरों की चमक-धमक बढ़ी है। वह कहती हैं कि सरकार ने गांवों के विकास के लिए न तो कभी सोचा और न कोई योजना अब तक बन पाई। वह कहती हैं कि गांव के लिए सिर्फ एक नहर बना दी जाए तो हम समझेंगे कि अलग राज्य बनने का फायदा होने लगा है।
निराशा में जी रहे हैं गांव वाले
अमतड़ निवासी बसंती देवी का कहना है कि पहले गांव में ही फसल का इतना उत्पादन हो जाता था कि सालभर के खाने की व्यवस्था हो जाती थी। अब तो गेहूं और दाल के लिए बाजार पर निर्भर रहना पड़ता है। सरकार की नीतियों के कारण अब सरकारी दुकानों में राशन भी पर्याप्त नहीं मिलता। वह कहती हैं कि गांव में रहने वालों के मन में निराशा का भाव जाग रहा है।