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खोजबीन का काम बंद, लौटे जवान

Sat, 09 Jul 2016 10:06 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, बस्तड़ी/डीडीहाट
ब्यूरो/अमर उजाला, बस्तड़ी/डीडीहाट Updated Sat, 09 Jul 2016 10:06 PM IST
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Diagnostic work-off, returned the young
सामान समेटकर लौटते एनडीआरएफ के जवान - फोटो : अमर उजाला

एक जुलाई से मलबे में दबे लोगों की खोजबीन में लगे एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, एसएसबी, आईटीबीपी, पुलिस और पीएसी के जवान अपना सामान समेटकर शनिवार सुबह बस्तड़ी से चले गए हैं। बस्तड़ी में अब सन्नाटा पसरा है। एनडीआरएफ के सहायक सेनानायक वेगराज मीणा ने बताया कि विशेष परिस्थिति को देखते हुए बस्तड़ी में 132 घंटे तक ऑपरेशन चलाया गया। उन्होंने कहा कि मलबा तीन से पांच किलोमीटर की दूरी तक फैला है। इस कारण मलबे में दबे लोगों के निकलने की संभावना बहुत है। उन्होंने बताया कि उनके 68 जवान शनिवार को गाजियाबाद लौट रहे हैं।

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एसडीआरएफ की टीम भी बस्तड़ी से लौट गई है। आईटीबीपी के सातवीं वाहिनी के जवानों ने बस्तड़ी में तत्काल मोर्चा संभाला था। आईटीबीपी के सेनानी महेंद्र प्रताप ने बताया कि बस्तड़ी में खोज एवं बचाव के साथ-साथ घायलों को इलाज देने में भी उनकी वाहिनी ने काम किया। कई घायलों को वाहिनी के अस्पताल लाकर इलाज किया गया। उन्होंने कहा कि जवानों ने विषय हालातों में भी बेहतरीन ढंग से रेस्क्यू अभियान चलाया। वहीं, बस्तड़ी में अब लोगों की आवाजाही लगभग बंद है। गांव मलबे से पटा है। घर जमींदोज हो गए हैं। पूरा गांव शिफ्ट हो चुका है।
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मलबे से बच्चों की कुछ निशानी तो मिल जाए
बस्तड़ी/डीडीहाट। बस्तड़ी की आपदा ने कई बच्चों, जवानों को लील लिया था। अब महिलाएं जमींदोज हो चुके मकानों के आसपास छोटी कुदाल लेकर इस उम्मीद में खुदाई कर रही हैं कि शायद उनको बच्चों की कोई निशानी मिल जाए। अधिकांश लोगों के पास तो बच्चों के फोटोग्राफ तक नहीं बचे हैं। पिछले दो दिन से महिलाएं टूटे घरों के आसपास खोजबीन में लगी हैं। कई महिलाओं का सुहाग तो उजड़ा है, लेकिन सुहाग की निशानी भी मलबे में दफन हो गई। जेवरात, सिंदूर, रंग्वाली पिछौड़ा, साड़ियां, कपड़े, चप्पल सभी कुछ मलबे में दब चुका है। अब यदि यह मिलता भी है तो वह मलबे से सना होगा। बस्तड़ी में विषमताओं का दौर शुरू हो चुका है। हर जीवित व्यक्ति की आंखों में सिर्फ आंसू के अलावा कुछ नहीं है। वह तनाव की स्थिति में हैं। शोक, अपनों को खोने का दुख हर किसी को हो गया है।

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