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धारचूला में सीधी लड़ाई के बीच बन रहा हल्का त्रिकोण

Sat, 11 Feb 2017 10:29 PM IST
कालिका रावल/अमर उजाला, पिथौरागढ़
कालिका रावल/अमर उजाला, पिथौरागढ़ Updated Sat, 11 Feb 2017 10:29 PM IST
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Dharchula becoming straight fight between light triangle
चुनाव को लेकर अपनी राय रखते नया बस्ती के आपदा प्रभावित - फोटो : अमर उजाला

दो बार निर्दलीय और एक बार कांग्रेस की झोली में गई धारचूला विधानसभा सीट पर कांग्रेस, भाजपा के बीच सीधा मुकाबला है। उक्रांद के सीमित जनाधार के बीच एक निर्दलीय प्रत्याशी हल्का त्रिकोण बनाता इस सीट पर नजर आ रहा है। धारचूला सीट पर कांग्रेस, भाजपा के भीतर बगावत और भितरघात जैसी कोई बात दिखाई नहीं दे रही है। हर साल धारचूला विधानसभा क्षेत्र आपदा की त्रासदी झेलता है, लेकिन हैरानी की बात है कि चुनावी मुद्दे के रूप में आपदा शामिल दिखाई नहीं देता। आपदा और आपदा प्रभावितों के मुद्दे न उठने से आपदा का दंश झेल रहे लोगों में आक्रोश भी है। आपदा प्रभावितों के निशाने पर प्रदेश की सत्ता में रहे दोनों दल हैं। अलबत्ता प्रत्याशियों का फोकस एससी, एसटी, ओबीसी के साथ ही ब्राह्मण वोटों पर अधिक है।

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राज्य गठन के बाद अस्तित्व में आई धारचूला सीट पर पहले दो चुनाव निर्दलीय गगन सिंह रजवार जीतने में कामयाब रहे। वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का युवा चेहरा हरीश धामी अप्रत्याशित रूप से धारचूला सीट को जीतने में कामयाब रहे। वर्ष 2014 में धामी ने मुख्यमंत्री हरीश रावत के लिए सीट छोड़ी। उप चुनाव में हरीश रावत धारचूला से जीते। धारचूला में इस बार धामी को भाजपा में नए नवेले आए वीरेंद्र पाल उर्फ वीरेंद्रानंद से पार पाना है। वर्ष 2012 का चुनाव उत्तराखंड रक्षा मोर्चा से लड़े वीरेंद्रानंद कुछ महीने पहले ही भाजपा में शामिल हुए हैं। धारचूला सीट पर करीब 55 प्रतिशत फीसदी ओबीसी, 33 प्रतिशत अनुसूचित जाति, जनजाति और करीब 12 प्रतिशत सामान्य जाति के मतदाता हैं।
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अमर उजाला की टीम ने जब नाचनी, धामीगांव, बांसबगड़, रसियाबगड़, तेजम, क्वीटी क्षेत्र में चुनावी हालात का जायजा लिया तो यहां लोग भाजपा, कांग्रेस, निर्दलीय के बीच बंटे नजर आए। वहीं, राजनीतिक दलों की नजर एससी, एसटी, ओबीसी वोटरों पर है। इसके लिए आपसी संबंधों का सहारा लिया जा रहा है। रिश्तेदारी, नातेदारी का वास्ता देकर वोटरों को लुभाने का प्रयास कर रहे हैं। निर्दलीय उम्मीदवार दुर्गा प्रसाद का अनुसूचित जाति से ताल्लुक होने के कारण वह इस तबके के बीच पैठ बनाने की कोशिशों में हैं। इससे इस सीट पर हल्का त्रिकोण बनाता नजर आ रहा है।
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इस सब के बीच इलाके के आपदा प्रभावितों का दर्द अपनी जगह बरकरार है। अमर उजाला ने नई बस्ती (नाचनी) के आपदा प्रभावितों के बीच की चुनावी हलचल का जायजा लिया। आपदा प्रभावितों में चुनाव में भी आपदा प्रभावितों के लिए कोई ठोस बात सामने न आने का दर्द साफ दिखा। आपदा प्रभावित चंपा देवी, हीरा देवी, इंदिरा देवी, खड़क राम, प्रमिला देवी, तारा देवी, कमला देवी काफी व्यथित थीं। इनका कहना था कि वह लोग वर्ष 1974, 75 से आपदा की मार झेल रहे हैं। भूस्खलन के कारण भैंसखाल गांव को छोड़ना पड़ा। नई बस्ती में आकर बसे तो सितंबर 2011 में गटघोरगाड़ी की पहाड़ी दरकने से नई बस्ती पूरी तरह तबाह हो गई और 22 परिवार बेघर हो गए। कई प्रभावित नाते, रिश्तेदारों के वहां रह रहे हैं। कई किराए में रहते हैं।

कई गरीब परिवार बरसात को छोड़कर खतरे की जद में आए मकानों में रहने पर मजबूर हैं। इन लोगों का कहना था कि दोनों दलों (भाजपा, कांग्रेस) की सरकारों से उनकी अपेक्षाएं पूरी नहीं हुई। आपदा प्रभावितों का कहना था कि उन लोगों के सवाल भी चुनावी मुद्दे बनने चाहिए। 30 जून, 1 जुलाई 2016 के कुमालगौनी के आपदा प्रभावित नाचनी के सामुदायिक भवन में रह रहे हैं। इनका भी एक अदद घर का सपना राजनीतिक दलों के एजेंडे में दिखाई नहीं दे रहा है।

बोल्डर गिरते हैं तो कांप उठती है धरती
नई बस्ती की आपदा प्रभावित मतो देवी कहती हैं कि गटघोरगाड़ी की पहाड़ी से रात को बोल्डर गिरते हैं। उस  समय धरती कांप उठती है। आपदा प्रभावितों को सुरक्षित स्थान पर बसाने के लिए नेताओं को प्रयास करने चाहिए।


भूमिहीनों की समस्या कोई नहीं सुलझाता
आपदा प्रभावित भागीरथी देवी का कहना था कि नई बस्ती के आपदा प्रभावित भूमिहीन हैं। 22 परिवारों में से मात्र 7 परिवारों को छह महीने पहले 12-12 मुट्ठी जमीन सरकार ने आवंटित की है। शेष 15 परिवारों के पास एक इंच भी भूमि नहीं है। उनकी समस्या कोई नेता नहीं सुलझाता।

2017 विस चुनाव
कांग्रेस हरीश धामी
भाजपा वीरेंद्र पाल
यूकेडी लाल सिंह खंपा
बसपा जितेंद्र प्रसाद
निर्दलीय दुर्गा प्रसाद, वीरेंद्र सिंह, लक्ष्मी दत्त पंत, देवेंद्र सिंह

विस प्रोफाइल धारचूला
83739 -कुल मतदाता
42217 - महिला मतदाता
41522 - पुरुष मतदाता

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