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किसानों के बारे में कोई सरकार नहीं सोचती

Thu, 22 Jun 2017 10:55 PM IST
Updated Thu, 22 Jun 2017 10:55 PM IST
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किसानों के बारे में कोई सरकार नहीं सोचती
किसानों के बारे में कोई सरकार नहीं सोचती
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थल (पिथौरागढ़)। पहाड़ पर खेतीबाड़ी का ज्यादातर बोझ महिलाएं ही उठाती हैं। यह बात अलग है कि बैंकों से लिए जाने वाले कर्ज के कागजात पुरुषों के जमा होते हैं। महिलाओं का कहना है कि कर्ज को लेकर सरकार की नीतियां लगातार किसानों का तनाव बढ़ाने वाली हैं। इसकी वजह यह भी है कि किसानों के बारे में कोई सरकार नहीं सोचती।

राज्य गठन के बाद पहाड़ के किसान की हालत ज्यादा खराब हुई है। कृषि उपज कम हो गई। सिंचाई के साधनों का कोई विकास नहीं हुआ और इन वर्षों में जंगली जानवरों का आतंक ज्यादा बढ़ा है। पहाड़ पर फसल के साथ-साथ सब्जी, फलों पर अब जंगली जानवरों का अधिकार हो गया है। महिलाओं का कहना है कि इतनी खराब हालातों के बीच खेतीबाड़ी का मन नहीं करता। सरकार यदि गंभीरता से नहीं सोचती तो पहाड़ के सभी खेत बंजर हो जाएंगे।
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पहाड़ का किसान भारी संकट में
अमतड़ निवासी कमला देवी का कहना है कि कृषि और उद्यानों के विकास के लिए किसी भी विभाग से कोई मदद नहीं मिलती। किसान अपने बूते पर ही उत्पादन करते हैं। सरकारी विभागों का काम सिर्फ आंकड़े तैयार करना है। इसी आंकड़ों की बाजीगरी में सरकार भी गुमराह हो रही है। वह कहती हैं कि पहाड़ का किसान सबसे ज्यादा संकट में है। इस पर ध्यान दिया जाए।
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किसान के बारे में कोई नहीं सोचता
बरड़ निवासी गंगा देवी का कहना है कि कर्ज लेने के लिए बैंक खुद ही प्रेरित करते हैं। कर्ज देते समय का व्यवहार अलग और कर्ज वसूली के समय का व्यवहार अलग रहता है। किसानों को कर्ज देकर मौत के मुंह में धकेलने वाली व्यवस्था का अंत होना चाहिए। वह कहती हैं कि किसान के बारे में कोई नहीं सोचता। उसे सबसे निचले दर्जे में रखा गया है।

किसानों के नाम पर प्रलाप बंद किया जाए
सिमार गांव निवासी भागीरथी देवी का कहना है कि किसानों को राहत देने के नाम पर बड़ा धोखा होता है। सूखा, बाढ़ राहत के नाम पर इतनी कम राशि दी जाती है कि उससे पांच किलो राशन खरीद पाना संभव नहीं होता। किसानों को राहत देने के लिए खूब नारेबाजी होती है। चुनाव के समय किसानों के हित में किए जाने वाले प्रलाप को बंद किया जाना चाहिए।


हर सरकार का रवैया एक समान
मस्मोली गांव निवासी दमयंती जोशी कहती हैं कि किसानों को इस स्थिति तक पहुंचाने के लिए सरकार जिम्मेदार है। अब तक जंगली जानवरों का आतंक समाप्त नहीं हो पाया। किसान की सारी मेहनत को जानवर चट कर देते हैं। सरकार से पूछा जाना चाहिए कि वह खेती को बचाने के लिए क्या कर रही है। पिछली सरकार हो या वर्तमान सरकार, सभी का रवैया एक सा है।
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