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लोक भाषाओं से अधिक से अधिक साहित्य लिया जाना चाहिए
Updated Sat, 10 Mar 2018 10:56 PM IST
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गंगोलीहाट (पिथौरागढ़)। पहाड़ संस्था की ओर से कविवर लोकरत्न पंत गुमानी के जन्मदिवस के अवसर पर हिमालयन ग्राम विकास समिति के सभागार में गोष्ठी का आयोजन किया गया। इसमें लोक भाषाओं के संरक्षण की दिशा में काम करने और लोक भाषाओं से अधिक से अधिक साहित्य लेने पर जोर दिया गया।
उत्तराखंड विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान केंद्र के सहयोग से ‘लोक भाषाओं में प्रकाशन, संपादन, व्यवस्था और सामाजिक सरोकार’ विषय पर आयोजित गोष्ठी में इतिहासकार डॉ. शेखर पाठक ने कहा कि कुमाऊंनी, गढ़वाली में बहुत सी मौलिक कविताएं हैं, लेकिन पढ़ने, लिखने की कमी के कारण लिखित रूप में नहीं आ पाई। लोक विशेषज्ञ प्रयाग जोशी ने कहा कि कुमाऊंनी बोली में लिखी गई कविताओं में छंद और कवित्व का होना जरूरी है। शैक्षिक दखल के संपादक महेश पुनेठा ने कहा कुमाऊंनी बोली में लिखी गई खराब कविता अच्छी कविता को छुपा रही है। कवि अतीत को लेकर मौनग्रस्त हैं। इस विसंगति को दूर किया जाना चाहिए।
पौड़ी गढ़वाल से आए धात पत्रिका के संपादक गणेश खुगशाल गणि ने कहा कि गढ़वाली और कुमाऊंनी साहित्य के लेखन के लिए दुनिया के साहित्य की जानकारी होना आवश्यक है। कवि जगदीश जोशी ने कहा वक्त के साथ-साथ कविता का अर्थ बदल जाता है, जो संपादकों के लिए भी एक चुनौती है। नेपाली, कुमाऊंनी और हिंदी भाषा के कवि अनिल कार्की ने कहा आज विकासक्रम को न समझ पाना कवि के लिए चुनौती है।
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कवि जुगल पेटशाली, कथाकार महावीर रावल्टा की अध्यक्षता में हुई गोष्ठी में प्रोफेसर उमा भट्ट, पृथ्वीराज सिंह, कपिल सेमवाल, देवकीनंदन, अभिषेक पेटशाली, दामोदर जोशी, प्रवीण भट्ट, डॉ. सरस्वती कोहली आदि मौजूद थे। हिमालयन ग्राम विकास समिति के अध्यक्ष राजेंद्र बिष्ट ने अतिथियों का स्वागत किया। रविवार को कविवर गुमानी के जन्मदिन पर उनके गांव उप्राड़ा में गुमानी पर केंद्रित पुस्तकों का विमोचन होगा।
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उत्तराखंड विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान केंद्र के सहयोग से ‘लोक भाषाओं में प्रकाशन, संपादन, व्यवस्था और सामाजिक सरोकार’ विषय पर आयोजित गोष्ठी में इतिहासकार डॉ. शेखर पाठक ने कहा कि कुमाऊंनी, गढ़वाली में बहुत सी मौलिक कविताएं हैं, लेकिन पढ़ने, लिखने की कमी के कारण लिखित रूप में नहीं आ पाई। लोक विशेषज्ञ प्रयाग जोशी ने कहा कि कुमाऊंनी बोली में लिखी गई कविताओं में छंद और कवित्व का होना जरूरी है। शैक्षिक दखल के संपादक महेश पुनेठा ने कहा कुमाऊंनी बोली में लिखी गई खराब कविता अच्छी कविता को छुपा रही है। कवि अतीत को लेकर मौनग्रस्त हैं। इस विसंगति को दूर किया जाना चाहिए।
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पौड़ी गढ़वाल से आए धात पत्रिका के संपादक गणेश खुगशाल गणि ने कहा कि गढ़वाली और कुमाऊंनी साहित्य के लेखन के लिए दुनिया के साहित्य की जानकारी होना आवश्यक है। कवि जगदीश जोशी ने कहा वक्त के साथ-साथ कविता का अर्थ बदल जाता है, जो संपादकों के लिए भी एक चुनौती है। नेपाली, कुमाऊंनी और हिंदी भाषा के कवि अनिल कार्की ने कहा आज विकासक्रम को न समझ पाना कवि के लिए चुनौती है।
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कवि जुगल पेटशाली, कथाकार महावीर रावल्टा की अध्यक्षता में हुई गोष्ठी में प्रोफेसर उमा भट्ट, पृथ्वीराज सिंह, कपिल सेमवाल, देवकीनंदन, अभिषेक पेटशाली, दामोदर जोशी, प्रवीण भट्ट, डॉ. सरस्वती कोहली आदि मौजूद थे। हिमालयन ग्राम विकास समिति के अध्यक्ष राजेंद्र बिष्ट ने अतिथियों का स्वागत किया। रविवार को कविवर गुमानी के जन्मदिन पर उनके गांव उप्राड़ा में गुमानी पर केंद्रित पुस्तकों का विमोचन होगा।