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छियालेख में इनरलाइन के औचित्य पर सवाल
Updated Mon, 04 Dec 2017 10:06 PM IST
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धारचूला (पिथौरागढ़)। पर्यटन विकास के नाम पर जौलजीबी से वर्ष 1999 में इनरलाइन की सीमा हटाकर छियालेख करने से लोगों में रोष है। इस मुद्दे पर पहले भी कई बार आंदोलन हो चुके हैं और अब बड़े आंदोलन की तैयारी की जा रही है।
वर्ष 1960 में भारत और चीन के बीच संबंध खराब हो जाने के कारण भारत ने अपनी सीमाओं को सुरक्षित करने के लिए इनरलाइन घोषित की थी। पहले यह सीमा जौलजीबी में थी। जौलजीबी से धारचूला की दूरी 30 किलोमीटर है। जौलजीबी से यदि कोई व्यक्ति धारचूला की तरफ जाना चाहे तो उसे इनरलाइन परमिट लेना पड़ता था।
यह परमिट जारी करने का अधिकार एसडीएम को दिया गया था। इनरलाइन परमिट की सीमा मात्र तीन दिन होती थी। उसमें धारचूला या उसके आसपास के इलाकों में जाने का कारण भी स्पष्ट करना पड़ता था।
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वर्ष 1999 में जिला प्रशासन की संस्तुति पर केंद्र सरकार ने धारचूला नगर को इनरलाइन के प्रतिबंध से मुक्त कर दिया और इनरलाइन को धारचूला से 55 किलोमीटर दूर छियालेख पहुंचा दिया। धारचूला से आगे छियालेख की तरफ आबादी का घनत्व बहुत कम है। वहां पर कोई बड़ा कस्बा या बाजार भी नहीं है।
अब इनरलाइन के प्रतिबंध छियालेख से आगे जाने पर ही लागू होते हैं। इस इलाके में ट्रैकिंग पर जाने वाले, भारत-तिब्बत व्यापार में हिस्सा लेने वाले ही जा पाते हैं। कुछ स्थानीय लोगों की भी आवाजाही होती है। इनरलाइन को जौलजीबी लाए जाने के पीछे लोगों का तर्क है कि इनरलाइन के प्रतिबंध हटने के बाद धारचूला नगर में बाहरी लोगों की आवाजाही बेहिसाब बढ़ी है।
आपराधिक घटनाओं में लगातार वृद्धि होने लगी है। ऐसे में इनरलाइन को छियालेख से जौलजीबी लाया जाए। इनरलाइन के मुद्दे पर आवाज उठा रहे व्यापार संघ अध्यक्ष भूपेंद्र थापा, समाजसेवी वीरेंद्र नबियाल का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से भी यह कदम उठाना जरूरी हो गया है।
आज डीएम के सामने उठेगा मुद्दा
डीएम सी रविशंकर मंगलवार को बाराकोट तहसील दिवस में मौजूद रहेंगे। पिछले दिनों धारचूला भ्रमण के समय उन्होंने लोगों को आश्वस्त किया था कि इनरलाइन के मुद्दे पर तहसील दिवस में बात होगी। यहां के लोग पूरे तर्कों और तथ्यों के साथ इनरलाइन का मुद्दा डीएम के सामने रखेंगे। उसके बाद यह मामला केंद्रीय गृहमंत्री तक पहुंचाने की योजना है।
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वर्ष 1960 में भारत और चीन के बीच संबंध खराब हो जाने के कारण भारत ने अपनी सीमाओं को सुरक्षित करने के लिए इनरलाइन घोषित की थी। पहले यह सीमा जौलजीबी में थी। जौलजीबी से धारचूला की दूरी 30 किलोमीटर है। जौलजीबी से यदि कोई व्यक्ति धारचूला की तरफ जाना चाहे तो उसे इनरलाइन परमिट लेना पड़ता था।
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यह परमिट जारी करने का अधिकार एसडीएम को दिया गया था। इनरलाइन परमिट की सीमा मात्र तीन दिन होती थी। उसमें धारचूला या उसके आसपास के इलाकों में जाने का कारण भी स्पष्ट करना पड़ता था।
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वर्ष 1999 में जिला प्रशासन की संस्तुति पर केंद्र सरकार ने धारचूला नगर को इनरलाइन के प्रतिबंध से मुक्त कर दिया और इनरलाइन को धारचूला से 55 किलोमीटर दूर छियालेख पहुंचा दिया। धारचूला से आगे छियालेख की तरफ आबादी का घनत्व बहुत कम है। वहां पर कोई बड़ा कस्बा या बाजार भी नहीं है।
अब इनरलाइन के प्रतिबंध छियालेख से आगे जाने पर ही लागू होते हैं। इस इलाके में ट्रैकिंग पर जाने वाले, भारत-तिब्बत व्यापार में हिस्सा लेने वाले ही जा पाते हैं। कुछ स्थानीय लोगों की भी आवाजाही होती है। इनरलाइन को जौलजीबी लाए जाने के पीछे लोगों का तर्क है कि इनरलाइन के प्रतिबंध हटने के बाद धारचूला नगर में बाहरी लोगों की आवाजाही बेहिसाब बढ़ी है।
आपराधिक घटनाओं में लगातार वृद्धि होने लगी है। ऐसे में इनरलाइन को छियालेख से जौलजीबी लाया जाए। इनरलाइन के मुद्दे पर आवाज उठा रहे व्यापार संघ अध्यक्ष भूपेंद्र थापा, समाजसेवी वीरेंद्र नबियाल का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से भी यह कदम उठाना जरूरी हो गया है।
आज डीएम के सामने उठेगा मुद्दा
डीएम सी रविशंकर मंगलवार को बाराकोट तहसील दिवस में मौजूद रहेंगे। पिछले दिनों धारचूला भ्रमण के समय उन्होंने लोगों को आश्वस्त किया था कि इनरलाइन के मुद्दे पर तहसील दिवस में बात होगी। यहां के लोग पूरे तर्कों और तथ्यों के साथ इनरलाइन का मुद्दा डीएम के सामने रखेंगे। उसके बाद यह मामला केंद्रीय गृहमंत्री तक पहुंचाने की योजना है।