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महिला दिवस से अनभिज्ञ है हरूली आमा
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्रबेड़ीनाग (पिथौरागढ़)। लिंगुरानी ग्राम पंचायत के भूनी तोक की 70 साल की हरूली देवी को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की न तो जानकारी है और न ही उसे इसकी परवाह है। हर पल एकाकी जीवन से तिल तिल के संघर्ष की गाथा लिख रही हरूली आमा के जीवन में चार बकरियां हैं, दूर गांवों में ब्याही दो बेटियां हैं और वृद्धावस्था से अकेले अपने दम पर लड़ने की जिजीविषा है।
हरूली के पति बहादुर सिंह की करीब आठ साल पहले मृत्यु हो गई थी। वह खेती-किसानी का काम करते थे। परिवार में उसकी दो विवाहिता पुत्रियां हैं। बड़ी पुत्री कौशल्या घांघल गांव में और छोटी मंजू ग्वाल गांव में ब्याही है। पति की मौत के बाद हरूली एकदम अकेली पड़ गई।
विवाहिता पुत्रियां आर्थिक रूप से साधारण परिवार की हैं। इसके बावजूद वह कभी-कभार आकर अकेली मां की देखभाल करती हैं। हरूली को 300 रुपए की वृद्धावस्था पेंशन मिलती है। एकाकीपन से बचने के लिए हरूली आमा ने शुरूआत में दो बकरियां पालीं। अब यही बकरियां उनके सुख-दुख की साथी हैं। अपना पूरा लाड़प्यार वो इनमें उड़ेलती है। उनका कहना है म्यार लीजि काल ले हरा ग्यो अर्थात मेरे लिये मौत भी गुम हो गयी है।
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हरूली के पति बहादुर सिंह की करीब आठ साल पहले मृत्यु हो गई थी। वह खेती-किसानी का काम करते थे। परिवार में उसकी दो विवाहिता पुत्रियां हैं। बड़ी पुत्री कौशल्या घांघल गांव में और छोटी मंजू ग्वाल गांव में ब्याही है। पति की मौत के बाद हरूली एकदम अकेली पड़ गई।
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विवाहिता पुत्रियां आर्थिक रूप से साधारण परिवार की हैं। इसके बावजूद वह कभी-कभार आकर अकेली मां की देखभाल करती हैं। हरूली को 300 रुपए की वृद्धावस्था पेंशन मिलती है। एकाकीपन से बचने के लिए हरूली आमा ने शुरूआत में दो बकरियां पालीं। अब यही बकरियां उनके सुख-दुख की साथी हैं। अपना पूरा लाड़प्यार वो इनमें उड़ेलती है। उनका कहना है म्यार लीजि काल ले हरा ग्यो अर्थात मेरे लिये मौत भी गुम हो गयी है।
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