{"_id":"5a5259834f1c1baa268b82ac","slug":"21515346307-pithoragarh-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"आठ हजार हेक्टेयर फसल पर सूखे की मार","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
आठ हजार हेक्टेयर फसल पर सूखे की मार
Updated Sun, 07 Jan 2018 11:09 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
थल (पिथौरागढ़)। रामगंगा घाटी में इस बार गेहूं की फसल चौपट हो गई है। कई स्थानों पर तो नमी की कमी से बीज अंकुरित नहीं हो पाए। जिन स्थानों पर बीज उगे हैं तो उनको पाला झुलसाने लगा है। पूरी घाटी में किसान बेहद मायूस हैं और सूखे का सर्वे कर मुआवजा दिलाने की मांग करने लगे हैं। करीब आठ हजार हेक्टेयर फसल पर सूखे की मार पड़ी है।
रामगंगा घाटी के सत्यालगांव, गोल, अमतड़, लेजम, पतेत, डुंगरी, बरड़, आमथल, तुरगोली, रिठायत, बसौरा, गैरा, गंतोला, ससखेत, तड़ीगांव, मस्मोली, बलतिर, अठखेत समेत सभी गांवों में गेहूं और मसूर की फसल को व्यापक नुकसान पहुंचा है। सितंबर से इलाके में बारिश नहीं हुई। यहां अगर समय पर शीतकालीन बारिश हो जाए तो गेहूं का बेहतर उत्पादन होता है। कुछ परिवार अपने वर्षभर के राशन की व्यवस्था के बाद गेहूं और धान की बिक्री भी करते हैं। इस बार मौसम की बेरुखी ने किसानों की सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। जिन गांवों में सिंचाई नहरें हैं वह विभागीय लापरवाही के कारण ठप पड़ी हैं।
वहीं, शीतकाल में अब तक बारिश की बूंद न गिरने से जमीन में नमी समाप्त हो गई है। जो बीज उग रहे हैं उनकी वृद्धि नहीं हो पा रही है। ऊपर से कड़ाके की ठंड के दौरान गिर रहे पाले से फसलों को नुकसान पहुंच रहा है। इस घाटी के किसानों ने डीएम को पत्र लिखकर सूखे का सर्वे कराने और किसानों को राहत देने की मांग की है।
विज्ञापन
इस बीच कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जल्दी बारिश नहीं हुई तो फसलों को और नुकसान पहुंचेगा। कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. आरके सिंह ने कहा कि फसलों को पाले से बचाने के लिए सिंचाई की जरूरत होती है। इस बार बारिश न होने से पाले का प्रकोप ज्यादा हो रहा है।
किसानों को शीघ्र मुआवजा दिया जाए
किसान बसंती देवी का कहना है कि पहले खेतों तक नहरों का पानी पहुंच जाता था, लेकिन लंबे समय से नहरें बंद हैं और खेत सूख गए हैं। वह कहती हैं कि अधिकतर परिवारों की आजीविका का मुख्य साधन कृषि है, लेकिन मौसम की मार से कृषि चौपट होने लगी है। उन्होंने किसानों को जल्दी से मुआवजा देने की मांग की है।
बंद पड़ी नहरों को चालू किया जाए
किसान जमन राम का कहना है कि सरकारी लापरवाही से किसानों को ज्यादा नुकसान उठाना पड़ रहा है। नहरों को बनाने और उनकी मरम्मत पर हर साल लाखों रुपये खर्च होते हैं, लेकिन खेतों तक पानी की बूंद नहीं पहुंचती। वह कहते हैं कि सरकार को ऐसे मामलों की जांच करनी चाहिए और बंद पड़ी नहरों को चालू करना चाहिए।
विज्ञापन
रामगंगा घाटी के सत्यालगांव, गोल, अमतड़, लेजम, पतेत, डुंगरी, बरड़, आमथल, तुरगोली, रिठायत, बसौरा, गैरा, गंतोला, ससखेत, तड़ीगांव, मस्मोली, बलतिर, अठखेत समेत सभी गांवों में गेहूं और मसूर की फसल को व्यापक नुकसान पहुंचा है। सितंबर से इलाके में बारिश नहीं हुई। यहां अगर समय पर शीतकालीन बारिश हो जाए तो गेहूं का बेहतर उत्पादन होता है। कुछ परिवार अपने वर्षभर के राशन की व्यवस्था के बाद गेहूं और धान की बिक्री भी करते हैं। इस बार मौसम की बेरुखी ने किसानों की सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। जिन गांवों में सिंचाई नहरें हैं वह विभागीय लापरवाही के कारण ठप पड़ी हैं।
विज्ञापन
वहीं, शीतकाल में अब तक बारिश की बूंद न गिरने से जमीन में नमी समाप्त हो गई है। जो बीज उग रहे हैं उनकी वृद्धि नहीं हो पा रही है। ऊपर से कड़ाके की ठंड के दौरान गिर रहे पाले से फसलों को नुकसान पहुंच रहा है। इस घाटी के किसानों ने डीएम को पत्र लिखकर सूखे का सर्वे कराने और किसानों को राहत देने की मांग की है।
विज्ञापन
इस बीच कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जल्दी बारिश नहीं हुई तो फसलों को और नुकसान पहुंचेगा। कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. आरके सिंह ने कहा कि फसलों को पाले से बचाने के लिए सिंचाई की जरूरत होती है। इस बार बारिश न होने से पाले का प्रकोप ज्यादा हो रहा है।
किसानों को शीघ्र मुआवजा दिया जाए
किसान बसंती देवी का कहना है कि पहले खेतों तक नहरों का पानी पहुंच जाता था, लेकिन लंबे समय से नहरें बंद हैं और खेत सूख गए हैं। वह कहती हैं कि अधिकतर परिवारों की आजीविका का मुख्य साधन कृषि है, लेकिन मौसम की मार से कृषि चौपट होने लगी है। उन्होंने किसानों को जल्दी से मुआवजा देने की मांग की है।
बंद पड़ी नहरों को चालू किया जाए
किसान जमन राम का कहना है कि सरकारी लापरवाही से किसानों को ज्यादा नुकसान उठाना पड़ रहा है। नहरों को बनाने और उनकी मरम्मत पर हर साल लाखों रुपये खर्च होते हैं, लेकिन खेतों तक पानी की बूंद नहीं पहुंचती। वह कहते हैं कि सरकार को ऐसे मामलों की जांच करनी चाहिए और बंद पड़ी नहरों को चालू करना चाहिए।