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उत्तराखंड: कोरोना का असर, 149 वर्षों में पहली बार नहीं लगेगा जौलजीबी मेला

Tue, 10 Nov 2020 11:53 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पिथौरागढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पिथौरागढ़ Published by: हल्द्वानी ब्यूरो Updated Tue, 10 Nov 2020 11:53 PM IST
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Uttarakhand: Famous Jauljibi Mela Will not held this year for the first time in 149 years due to Coronavirus
काली नदी के तट पर ऐतिहासिक जौलजीबी मेला स्थल। फाइल फोटो - फोटो : PITHORAGARH

कोरोना के बढ़ते संक्रमण के चलते 149 वर्षों में पहली बार ऐतिहासिक जौलजीबी मेले का आयोजन नहीं होगा। इस मेले की नींव अस्कोट के पाल राजाओं ने रखी थी। अंग्रेजों ने भी 15 साल तक इस मेले का संचालन किया था। अस्कोट रियासत के भारत में विलय के आठ साल बाद सरकार मेले का संचालन करने लगी। 

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पाल राजवंश के पास मौजूद दस्तावेजों से पता चलता है कि व्यापारिक महत्व के जौलजीबी मेले की नींव अस्कोट रियासत के राजा पुष्कर पाल ने वर्ष 1871 में रखी थी। तब जौलजीबी में ज्वालेश्वर महादेव का मंदिर भी बनाया गया था। पुष्कर पाल के बाद अस्कोट रियासत की गद्दी संभालने वाले राजा गजेंद्र पाल और विक्रम पाल ने भी मेले का संचालन किया।
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युवराज टिकेंद्र पाल के नाबालिग होने के कारण वर्ष 1938 से 1947 तक रियासत का कामकाज अंग्रेजी हुकूमत ने अपने हाथ में ले लिया। वर्ष 1953 से 1967 में रियासत के भारत में विलय होने तक राजा टिकेंद्र पाल ने मेले का संचालन किया। वर्ष 1967 से 1974 तक भी पाल रियासत के वारिस ही मेले की व्यवस्थाओं को देखते रहे। 
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पाल राजवंश के वारिस राजा टिकेंद्र पाल के पुत्र कुंवर भानुराज पाल बताते हैं कि वर्ष 1975 में यूपी सरकार ने मेले को अपने हाथों में ले लिया था। तब से मेला देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के जन्मदिन  14 नवंबर से मनाया जाने लगा। 

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काली नदी में पुल बनाते थे

अस्कोट राजवंश के समय में मेले का दीदार करने वाले 90 साल के बुजुर्ग बहादुर सिंह पाल बताते हैं कि मेले के दौरान पाल राजा काली-गोरी नदी पर लकड़ी के अस्थायी पुल बनवाते थे। जर्मनी से मंगाए गए मिट्टी तेल से जलने वाले गैस से प्रकाश की व्यवस्था होती थी। अल्मोड़ा के जोगा लाल साह की मेले में लगने वाली दुकान से मिठाई खरीदने वालों की भीड़ रहती थी। ऐतिहासिक मेले में एक आने में बहुत सामान मिल जाता था। संवाद 

पशु, कृषि संबंधित सामान की लगती थी प्रदर्शनी 
जौलजीबी मेला वृहद स्तर पर फैला था। 1871 में पशु और कृषि यंत्रों की प्रदर्शनी लगती थी। जौलजीबी मेला जोग्यूड़ा, बगड़ीहाट, तीतरी आदि क्षेत्रों में लगता था। तब मेला डेढ़ माह तक चलता था। गाय, भैंस, बकरियों की मेले में अधिक खरीदारी होती थी। घोड़े, खच्चर मेले में बिक्री के लिए बहुत कम आते थे। मेले में दूरस्थ क्षेत्रों से आने वाले लोगों के रहने खाने की व्यवस्था पाल राजवंश के लोग ही करते थे। 

तिब्बत का नमक था प्रसिद्ध 
जौलजीबी मेले में तिब्बत के नमक की अधिक मांग थी। तिब्बती लोग गेहूं, चावल, मडुवा और जौ के बदले सामान देते थे। नेपाल का घी और शहद मालू के पत्तों के डोनों में बिक्री के लिए आता था। इसके साथ ही नेपाल का गुड़ लोगों की पहली पसंद होता था। लोग सालभर के लिए गुड़ खरीदते थे। मेले में तिब्बत, मथुरा, लोहाघाट, चंपावत, अल्मोड़ा, बागेश्वर से व्यापारी आते थे। तिब्बती अपने साथ नमक, सुहागा, ऊनी वस्त्र लेकर आते थे। रोशनी के लिए चर्बी के दीये जलाए जाते थे। 

मार्गशीर्ष में लगता था धार्मिक मेला 
जौलजीबी मेला 104 साल तक मार्गशीर्ष संक्रांति पर होता था। उस समय संक्रांति पर मेले में गंगा स्नान का बड़ा महत्व था। ऐतिहासिक जौलीजीबी मेले में क्षेत्रवासी कलशयात्रा निकालकर 149 साल पुरानी परंपरा को बनाए रखना चाहते हैं। 104 वर्ष तक मेले को धार्मिक रूप से मनाया जाता था। यहां आने वाले लोग काली गोरी नदी के संगम में स्नान, ज्वालेश्वर मंदिर में दर्शन और पूजन के बाद ही मेले में शिरकत करते थे। 

मेला न होने से लोगों में मायूसी  
जौलजीबी मेला न होने के कारण क्षेत्रवासियों में मायूसी है। उनका कहना है कि सरकार कई आयोजनों की अनुमति दे रही है। ऐसे में मेले का संचालन भी कोविड नियमों के तहत किया जाना चाहिए। सामाजिक कार्यकर्ता लीला बंग्याल ने कहा कि मेले की परंपरा बनाए रखने के लिए प्रशासन को कलशयात्रा निकालने की अनुमति देनी चाहिए। कोरोना गाइडलाइन तहत कलशयात्रा निकाली जाएगी। 

जौलजीबी मेला मेरे पूर्वजों ने शुरू किया था, जो लगातार बिना किसी रुकावट के स्थानीय लोगों की मदद से लगाया जाता था। ऐसे में स्थानीय लोगों के अनुरोध पर मेले की परंपरा को बनाए रखने के लिए कलशयात्रा निकाली जानी चाहिए। इसमें प्रशासन को सहयोग करना चाहिए। कोरोना काल में लोगों की सुरक्षा भी जरूरी है, लेकिन परंपरा भी जरूरी है।  
- युवराज कुंवर महिराज सिंह पाल, देवल दरबार अस्कोट।

कोरोना के कारण ऐतिहासिक जौलजीबी मेले का आयोजन इस बार नहीं किया जा रहा है।
-  एके शुक्ला, एसडीएम। 

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