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भाबर की ओर लौटने लगे भेड़पालक
Updated Tue, 06 Nov 2018 10:25 PM IST
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डीडीहाट (पिथौरागढ़)। उच्च हिमालयी क्षेत्र में ठंड शुरू होते ही भेड़पालक अब भाबर का रुख करने लगे हैं। इन दिनों टनकपुर-तवाघाट एनएच पर जगह-जगह भेड़-बकरियों के झुंड देखे जा सकते हैं। भेड़पालकों का कहना है कि इस बार ऊंचे इलाकों पर समय से पहले ठंड पड़ गई है।
ग्रीष्मकालीन प्रवास पर भेड़पालक मार्च में भाबर में गर्मी शुरू होते ही धारचूला, मुनस्यारी के उच्च हिमालयी क्षेत्रों का रुख करते हैं। बुग्यालों में भेड़-बकरियों को काफी मात्रा में हरी घास उपलब्ध होती है। अमूमन 15 नवंबर के बाद भेड़पालक ऊंचे क्षेत्रों से निचले इलाकों की ओर आते हैं। इस बार समय से पहले हिमपात होने और कड़ाके की ठंड पड़ने से भेड़पालक पहले ही नीचे की ओर आ गए हैं।
सोमवार रात ओगला में भेड़पालकों का रात्रि प्रवास था। मंगलवार सुबह भेड़पालक आगे की यात्रा पर रवाना हुए। धारचूला के कुटी गांव के भेड़पालक जितेंद्र सिंह ने बताया कि उनके और साथियों के पास करीब पांच हजार भेड़-बकरियां हैं। वह टनकपुर-खटीमा में मार्च तक रुकेंगे। इसके बाद फिर से उच्च हिमालयी क्षेत्र को रवाना हो जाएंगे।
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जितेंद्र ने बताया कि तराई-भाबर का मौसम भेड़ों के बच्चों (मेमना) के लिए बेहद अनुकूल होता है। मेमने तीन-चार माह के होने के बाद उन्हें कोई परेशानी नहीं होती है। बाद में गर्मी शुरू होने पर उन्हें हिमालयी बुग्यालों में भरपूर हरी घास, जड़ीबूटी खाने को मिलती है। इससे मेमने स्वस्थ रहते हैं।
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ग्रीष्मकालीन प्रवास पर भेड़पालक मार्च में भाबर में गर्मी शुरू होते ही धारचूला, मुनस्यारी के उच्च हिमालयी क्षेत्रों का रुख करते हैं। बुग्यालों में भेड़-बकरियों को काफी मात्रा में हरी घास उपलब्ध होती है। अमूमन 15 नवंबर के बाद भेड़पालक ऊंचे क्षेत्रों से निचले इलाकों की ओर आते हैं। इस बार समय से पहले हिमपात होने और कड़ाके की ठंड पड़ने से भेड़पालक पहले ही नीचे की ओर आ गए हैं।
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सोमवार रात ओगला में भेड़पालकों का रात्रि प्रवास था। मंगलवार सुबह भेड़पालक आगे की यात्रा पर रवाना हुए। धारचूला के कुटी गांव के भेड़पालक जितेंद्र सिंह ने बताया कि उनके और साथियों के पास करीब पांच हजार भेड़-बकरियां हैं। वह टनकपुर-खटीमा में मार्च तक रुकेंगे। इसके बाद फिर से उच्च हिमालयी क्षेत्र को रवाना हो जाएंगे।
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जितेंद्र ने बताया कि तराई-भाबर का मौसम भेड़ों के बच्चों (मेमना) के लिए बेहद अनुकूल होता है। मेमने तीन-चार माह के होने के बाद उन्हें कोई परेशानी नहीं होती है। बाद में गर्मी शुरू होने पर उन्हें हिमालयी बुग्यालों में भरपूर हरी घास, जड़ीबूटी खाने को मिलती है। इससे मेमने स्वस्थ रहते हैं।