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जीवटता है हेमा की पहचान
Updated Wed, 27 Jun 2018 11:12 PM IST
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पिथौरागढ़। तीलू रौतेली पुरस्कार के लिए चुनी गईं हेमा थलाल का जीवन संघर्षपूर्ण रहा है। जीवटता हेमा की पहचान रही है। विवाह के महज आठ साल बाद पति की मृत्यु के बाद भी हेमा ने साहस नहीं खोया। तीन बेटियों की परवरिश की। हेमा वास्तव में इस पुरस्कार की असली हकदार हैं।
1984 में बलुवाकोट के विष्णु दत्त के घर में जन्मीं हेमा को धारा के विपरीत जाने के लिए पहचाना जाता है। 2002 में वह बलुवाकोट महाविद्यालय में पढ़ती थीं। छात्रसंघ के चुनाव में उन्होंने छात्रा उपाध्यक्ष पद पर लड़ने के बजाय कोषाध्यक्ष पद पर नामांकन कराया और चुनाव जीता। महज 18 साल की उम्र में हेमा ने रूढ़ियों को तोड़ते हुए मदन थलाल से अंतरजातीय विवाह किया। मदन और उनका साथ केवल आठ साल रहा। विवाह के आठवें साल उनके पति का निधन हो गया। पति की मौत ने हेमा को झकझोर कर रख दिया, लेकिन हेमा ने हौसला नहीं खोया। तीन बेटियों की परवरिश के साथ ही अपनी पढ़ाई जारी रखी और एमए किया।
हेमा का बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान में अहम योगदान रहा है। वह गांव-गांव जाकर लोगों को बेटियों के संरक्षण के लिए प्रोत्साहित करती रही हैं। हेमा के कार्य को देखते हुए प्रशासन ने उन्हें बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान का जिला संयोजक बनाया। हेमा आज भी इस अभियान से जुड़ी हुई हैं। हेमा ने ‘लोक विमर्श और पहाड़ का दर्द’ नामक पुस्तकें भी लिखी हैं। हेमा कहती हैं कि समाजसेवा को लेकर साफ नजरिये ने आगे बढ़ने में उनकी मदद की। कहती हैं कि बेटियों के संरक्षण की उनकी मुहिम ता जिंदगी जारी रहेगी। हेमा वर्तमान में अपनी तीन बेटियों के साथ पिथौरागढ़ में रहती हैं।
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1984 में बलुवाकोट के विष्णु दत्त के घर में जन्मीं हेमा को धारा के विपरीत जाने के लिए पहचाना जाता है। 2002 में वह बलुवाकोट महाविद्यालय में पढ़ती थीं। छात्रसंघ के चुनाव में उन्होंने छात्रा उपाध्यक्ष पद पर लड़ने के बजाय कोषाध्यक्ष पद पर नामांकन कराया और चुनाव जीता। महज 18 साल की उम्र में हेमा ने रूढ़ियों को तोड़ते हुए मदन थलाल से अंतरजातीय विवाह किया। मदन और उनका साथ केवल आठ साल रहा। विवाह के आठवें साल उनके पति का निधन हो गया। पति की मौत ने हेमा को झकझोर कर रख दिया, लेकिन हेमा ने हौसला नहीं खोया। तीन बेटियों की परवरिश के साथ ही अपनी पढ़ाई जारी रखी और एमए किया।
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हेमा का बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान में अहम योगदान रहा है। वह गांव-गांव जाकर लोगों को बेटियों के संरक्षण के लिए प्रोत्साहित करती रही हैं। हेमा के कार्य को देखते हुए प्रशासन ने उन्हें बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान का जिला संयोजक बनाया। हेमा आज भी इस अभियान से जुड़ी हुई हैं। हेमा ने ‘लोक विमर्श और पहाड़ का दर्द’ नामक पुस्तकें भी लिखी हैं। हेमा कहती हैं कि समाजसेवा को लेकर साफ नजरिये ने आगे बढ़ने में उनकी मदद की। कहती हैं कि बेटियों के संरक्षण की उनकी मुहिम ता जिंदगी जारी रहेगी। हेमा वर्तमान में अपनी तीन बेटियों के साथ पिथौरागढ़ में रहती हैं।
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