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डगमगाते कदमों से छोड़ रहे पहाड़वासी 'पहाड़'

Sun, 04 Aug 2013 09:53 AM IST
उत्तरकाशी/पंकज गुप्ता
उत्तरकाशी/पंकज गुप्ता Updated Sun, 04 Aug 2013 09:53 AM IST
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Phadhwasi steps are left to stagger 'mountain'

जो पहाड़वासी सदियों से हिमालय की गोद में तमाम आपदाओं को झेलते रहे आज वही भारी दिल से अपने पुश्तैनी घरों को छोड़कर किराए के भवनों में नई जिंदगी की शरुआत करने के लिए डगमगाते हुए कदमों से आगे बढ़ गए हैं।

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आपदाओं से पहले भी सामना होता रहा। नए सिरे से फिर खड़ा होने की कोशिशें होती रही। अब जून की भीषण बाढ़ में जीवनभर मेहनत की कमाई गंवाने के बाद शंभू प्रसाद नौटियाल ने उत्तरकाशी से पलायन करना ही मुनासिब समझा। उन्होंने बताया कि जीवन के कई उतार चढ़ाव देखे।
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कई आपदाएं झेलीं। अपना जीवन तो जी चुका हूं, लेकिन नाती-पोतों के भविष्य को देखते हुए मन मार कर उत्तरकाशी छोड़ने को मजबूर होना पड़ा। 65 वर्षीय नौटियाल बताते हैं कि नौ वर्ष की आयु में जंगल में घास काटने के काम से जीवन की शुरुआत की थी।
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बदलाव में सब चलता रहा
हाईस्कूल में पढ़ते हुए कपड़े की दुकान चलाई। वर्ष 1975 में यह दुकान अग्निकांड में स्वाह हो गई। कुछ नया करने का जज्बा था, इसलिए अपने मित्र ऋकेश्वर प्रसाद कुड़ियाल के साथ मिलकर पिक्चर हॉल खोला। बदलाव के इस दौर में 2004 में वह भी बंद हो गया।

वर्ष 1978 की बाढ़ में भी कारोबार को नुकसान हुआ। 1991 के भूकंप की तबाही ने भीतर तक हिला दिया। वर्ष 2003 के वरुणावत भूस्खलन से बहुमंजिला होटल भी जमींदोज हो गया था।

बाढ़ ने सब उजाड़ दिया
इस सबके बाद भी उत्तरकाशी छोड़ने का विचार मन में नहीं आया। वर्ष 2006 में नेताला में बीएड कालेज की नींव डाली। बीते सत्र में ही यहां कक्षाएं शुरू हुई थीं कि जून 2013 की बाढ़ ने सब उजाड़ दिया।

जोशियाड़ा वाली संपत्ति तथा तिलोथ पुल वाले हिस्से से हुए कटाव के कारण बाड़ाहाट का आवासीय भवन भी खतरे की में है। मेरा मन तो अब भी उत्तरकाशी छोड़ने को नहीं करता, लेकिन बीमार बेटे तथा नाती-नातिन के भविष्य की चिंता ने उत्तरकाशी छोड़ने को मजबूर कर दिया।

घर छोड़ किराए पर शुरु किया जीवन
उत्तरकाशी में खुद का इतना बड़ा मकान जिसमें कई किरायेदार रहते हैं, लेकिन अब पत्नी, बेटा-बहू व नाती-नातिन को देहरादून में आठ हजार रुपये महीने पर आवास किराये पर लेकर शिफ्ट कर दिया है।

‘हिमालय टूट सकता है पर झुक नहीं सकता’
शंभू प्रसाद नौटियाल बताते हैं कि हिमालय पुत्र स्व.हेमवती नंदन बहुगुणा की बात ही कुछ और थी। कांग्रेस से अलगाव के दौर में उनसे जुड़ने का मौका मिला। उनकी कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी (बाद में लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी) का वर्ष 1988 तक उत्तरकाशी का जिलाध्यक्ष रहा।


तन, मन, धन से उनका साथ दिया, लेकिन इस दौर में उत्तराखंड के सर्वेसर्वा बने उनके पुत्र और नाती ने सुध लेने की जहमत भी नहीं उठाई। आज भी हिमालय पुत्र की नसीहत याद है कि ‘हिमालय टूट सकता है पर झुक नहीं सकता।’

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