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कश्मीर लद्दाख में तेजी से पिघल रहे ग्लेशियर
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श्रीनगर। हिमालयी रेंज में स्थित कश्मीर और लद्दाख में ग्लेशियर को लेकर चिंताजनक बात सामने आई है। शोध में पता चला है कि हिमालय में 1200 से अधिक ग्लेशियर वर्ष 2000 और 2012 के बीच औसतन 35 सेंटीमीटर की दर से पिघल रहे हैं। जर्नल ऑफ साइंटिफि क रिपोर्ट्स में प्रकाशित इस शोध को जम्मू, कश्मीर और लद्दाख इलाके में नियंत्रण रेखा (एलओसी) और वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के इलाकों सहित सभी क्षेत्रों में किया गया था। रिपोर्ट के लिए 12243 ग्लेशियर की प्रवृत्ति, बदलाव और स्थिति के बारे में शोध किया गया है।
शोध के मुताबिक पीर पंजाल रेंज में ग्लेशियर सबसे अधिक तेजी से पिघल रहे हैं। यहां ग्लेशियर हर साल एक मीटर से अधिक मोटाई में पिघल रहे हैं। जबकि काराकोरम रेंज में ग्लेशियर अपेक्षाकृत धीमी गति से पिघल रहे हैं। यहां हर साल लगभग 10 सेंटीमीटर परत पिघल रही है। कश्मीर विश्वविद्यालय के जियो इंफ ार्मेटिक विभाग के प्रो. शकील रोमशो, डॉ. तारिक अब्दुल्ला व डॉ. इरफ ान रशीद ने ग्लेशियरों के पिघलने की स्थिति पर शोध किया। उनकी रिपोर्ट नेचर रिसर्च साइंटिफि क जर्नल में प्रकाशित हुई है।
प्रो रोमशो ने बताया कि कुछ ग्लेशियर काराकोरम रेंज में आगे बढ़ रहे हैं या स्थिर हैं। ग्रेटर हिमालयन रेंज, जंस्कार रेंज, शम्सबरी ग्लेशियर, लेह पर्वतमाला जैसी अन्य पर्वत शृंखलाओं में ग्लेशियर निस्संदेह पिघल रहे हैं, लेकिन पिघलने की दर परिवर्तनीय है। शम्सबरी ग्लेशियर की 128 सेंटीमीटर मोटी परत हर साल पिघल जाती है। ग्लेशियर की परत हिमालय की जंस्कार रेंज में भी कम हो रही है। इस क्षेत्र में हर साल 117 सेंटीमीटर परत पिघल रही है।
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टीम ने नासा की ओर से वर्ष 2000 में और जर्मन अंतरिक्ष एजेंसी डीएलआर की ओर से 2012 में किए गए दो उपग्रह प्रेक्षणों का उपयोग किया। उन्होंने पूरे ऊपरी सिंधु बेसिन पर ग्लेशियर की मोटाई में परिवर्तन का निर्धारण करने के लिए 12 हजार से अधिक ग्लेशियरों को मिलाकर इस डाटा का पता किया।
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शोध के मुताबिक पीर पंजाल रेंज में ग्लेशियर सबसे अधिक तेजी से पिघल रहे हैं। यहां ग्लेशियर हर साल एक मीटर से अधिक मोटाई में पिघल रहे हैं। जबकि काराकोरम रेंज में ग्लेशियर अपेक्षाकृत धीमी गति से पिघल रहे हैं। यहां हर साल लगभग 10 सेंटीमीटर परत पिघल रही है। कश्मीर विश्वविद्यालय के जियो इंफ ार्मेटिक विभाग के प्रो. शकील रोमशो, डॉ. तारिक अब्दुल्ला व डॉ. इरफ ान रशीद ने ग्लेशियरों के पिघलने की स्थिति पर शोध किया। उनकी रिपोर्ट नेचर रिसर्च साइंटिफि क जर्नल में प्रकाशित हुई है।
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प्रो रोमशो ने बताया कि कुछ ग्लेशियर काराकोरम रेंज में आगे बढ़ रहे हैं या स्थिर हैं। ग्रेटर हिमालयन रेंज, जंस्कार रेंज, शम्सबरी ग्लेशियर, लेह पर्वतमाला जैसी अन्य पर्वत शृंखलाओं में ग्लेशियर निस्संदेह पिघल रहे हैं, लेकिन पिघलने की दर परिवर्तनीय है। शम्सबरी ग्लेशियर की 128 सेंटीमीटर मोटी परत हर साल पिघल जाती है। ग्लेशियर की परत हिमालय की जंस्कार रेंज में भी कम हो रही है। इस क्षेत्र में हर साल 117 सेंटीमीटर परत पिघल रही है।
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टीम ने नासा की ओर से वर्ष 2000 में और जर्मन अंतरिक्ष एजेंसी डीएलआर की ओर से 2012 में किए गए दो उपग्रह प्रेक्षणों का उपयोग किया। उन्होंने पूरे ऊपरी सिंधु बेसिन पर ग्लेशियर की मोटाई में परिवर्तन का निर्धारण करने के लिए 12 हजार से अधिक ग्लेशियरों को मिलाकर इस डाटा का पता किया।