मां फाउंडेशन की ओर से आयोजित गढ़वाली कवि सम्मलेन आकर्षण का केंद्र रहा। इस मौके पर पुराने मंझे हुए कवियों और उभरते कवियों ने अपनी कविताओं के माध्यम से देश और प्रदेश की सामाजिक और राजनैतिक व्यवस्थाओं पर जमकर तंज कसे। कवियों ने पहाड़ की पलायन की पीड़ा को बया कर कभी माहौल को भावुक किया तो कभी हास्य कवियों ने अपनी कविताओं से लोगों को गुदगुदाया भी।
अपर शिक्षा निदेशक (माध्यमिक) महावीर सिंह बिष्ट व नगर पालिका अध्यक्षा पूनम तिवाड़ी ने कवि सम्मेलन का शुभारंभ किया। इस मौके पर लोकभाषा आंदोलन के प्रणेता लोकेश नवानी ने अपनी कविता ढंडियुंद एक गीगाड़ च ढुंग मां से लोगों को गदगद कर दिया। जबकि हास्य कवि मुरली दीवान ने नेता ज्वे क्वे नी होंद दम खम चैंद भुला ने श्रोताओं को खूब हंसाया। आशावादी कवि तहसीलदार सुनील राज की कविता हम भी सोचणा तुम भी सोचणा कुछ ना कुछ अब खास होलु को खूब सराहा गया। जबकि ओमप्रकाश सेमवाल ने तेरी कलम मा धार नी रईं जरा पल्ये दे की प्रस्तुति दी। उपासना सेमवाल ने मि जनता का नौ कनु छौ सच्ची तुमारी सौ, कविता भट्ट की प्रस्तुति तु विसरी गे यू मासू कख बिटिन पायी त्वेन, साईनी उनियाल की कविता ऐंसु का साल देश की काया पलट ह्वेगी व सुमित रिंगवाल की हास्य व्यंग कविता न भुला तै कामन त नि होण व अजय शाह की प्रस्तुति फुदक फुदक नेता इथैं उथैं जाणा छन ने श्रोताओं का खूब मनोरंजन किया। जबकि पंकज नेगी, मेघा गोस्वामी, सचिन कठैत ने भी अपनी कविताओं से श्रोताओं का ध्यान अपनी और खींचा। इस मौके पर गढ़वाली भाषा पर कार्य करने वाले कवि लोकेश नवानी और संपूर्णानंद जुयाल को भी सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में फाउंडेशन की अध्यक्षा प्रभा खंडूडी, सचिव सत्यजीत खंडूडी, संगीता फरासी, राकेश मोहन कंडारी, राधा मैंदोली, महेश गिरी, पूनम रतूडी व नयन कोठियाल आदि मौजूद थे।