तब कहीं नहीं मनी थी दीपावली

Pauri Updated Thu, 15 Nov 2012 12:00 PM IST
श्रीनगर। राज्य प्राप्ति आंदोलन के दौरान वर्ष 1994 की दीपावली उत्तराखंड राज्य के लोगों की भावनाओं की चीत्कार आज भी बयां करती है। उस समय दो अक्तूबर को मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा पर दमनकारी घटना हुई थी। इसके अगले दिन तीन नवंबर को दीपावली थी, मगर पहाड़ पर कहीं यह त्योहार नहीं मनाया गया। यहां तक कि दीपोत्सव के इस पर्व पर विरोध जताने के लिए उत्तराखंड के गांव तथा शहर के प्रत्येक घर में महालक्ष्मी पूजन के दिन दो घंटे तक अंधेरा पसरा रहा।
मेरू बि लाडु रैली मां गै छौ, बोड़ि कि औलू बोलि कि गै छौ, सासा लग्यूं रौं बरसूं तलक मैं, जिकुड़ि कु लाल घौर नि ऐ छौ जनकवि मुकेश उनियाल की इन लाइनों में उत्तराखंड राज्य, इस राज्य के लिए हुई शहादतों तथा माताओं-बहनों के दर्द और रामपुर तिराहे का सच बयां होता है। 2 अक्तूबर को रामपुर तिराहे पर हुई घटना के बाद उत्तराखंड के एक-एक शहर और कस्बे में कहीं धारा 144 तो कहीं कर्फ्यू जारी कर दिया गया था। इसी दौरान संयुक्त युवा छात्र संघर्ष समिति ने ऐलान किया कि मुजफ्फरनगर कांड के विरोध में उत्तराखंड के लोग दीवाली नहीं मनाएंगे। इतना ही नहीं दो घंटे तक रात्रि के समय सात बजे से नौ बजे तक उत्तराखंड अंधेरे में रहेगा। यह ऐलान कर्फ्यू तथा धारा 144 के बावजूद घर-घर तक पहुंचा और उत्तराखंड में वह दीवाली, काली रात की तरह मनाई गई। 3 नवंबर 1994 की वह दीपावली उत्तराखंड के आम जनमानस और आंदोलन से जुड़ी भावना को दर्शाने के लिए नाकाफी नहीं है।

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- आज भी उत्तराखंड के लोगों के लिए दीवाली, दीवाली नहीं है। ताजे जख्म उतने खतरनाक नहीं होते, जितने की नासूर बने पुराने जख्म। इसलिए गैरसैंण के प्रश्न पर एक बार फिर लामबंद होना ही चाहिए।
मुकेश उनियाल, लोककवि।

- राज्य आंदोलन में 2 अक्तूबर की घटना इस राज्य के आम आदमी पर प्रहार था। दीपोत्सव जैसे त्योहार का जिस स्तर पर विरोध हुआ था, वह इसे स्पष्ट भी करता है। यह दुर्भाग्य ही है कि आज भी मुजफ्फरनगर कांड दोषियों को सजा नहीं मिल पाई है।
डा.एसपी सती, अध्यक्ष उत्तराखंड छात्र-युवा संघर्ष समिति।

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