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उत्तराखंड: हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया- प्रमोशन शुरू होने के बाद बीच में नियम नहीं बदले जा सकते

Fri, 11 Sep 2026 12:09 AM IST
Heera अमर उजाला नेटवर्क, नैनीताल
अमर उजाला नेटवर्क, नैनीताल Published by: Heera Updated Fri, 11 Sep 2026 12:09 AM IST
सार

नैनीताल हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि एक बार प्रमोशन की प्रक्रिया शुरू हो जाने के बाद उसके बीच में नियमों में बदलाव नहीं किया जा सकता। 

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Uttarakhand High Court clarified that the rules cannot be changed midway after the promotion has begun
उत्तराखंड हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

नैनीताल हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि एक बार प्रमोशन की प्रक्रिया शुरू हो जाने के बाद उसके बीच में नियमों में बदलाव नहीं किया जा सकता। साथ ही, मौजूदा नियमों के तहत प्रमोशन पर विचार किए जाने के अधिकार को केवल नियमों में बदलाव की प्रक्रिया शुरू करके या अयोग्य अभ्यर्थियों को लाभ पहुंचाने के लिए प्रक्रिया को मनमाने ढंग से रोककर समाप्त नहीं किया जा सकता।

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न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी और न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। कोर्ट ने यह टिप्पणी डिप्टी डायरेक्टर/चीफ एग्रीकल्चर ऑफिसर के पद पर प्रमोशन से जुड़े मामले में की। मामले के अनुसार डिप्टी डायरेक्टर/चीफ एग्रीकल्चर ऑफिसर के पद पर प्रमोशन की प्रक्रिया 29 दिसंबर 2020 को शुरू की गई थी। इसी बीच 31 दिसंबर 2020 को डेवलपमेंट ब्रांच के कुछ अधिकारियों ने कृषि मंत्री को प्रार्थना पत्र देकर क्लास-II पदों पर सिंगल विंडो सिस्टम लागू किए जाने की मांग की। मंत्री ने सचिव को निर्देश दिए कि नियमों में संशोधन होने तक प्रमोशन की प्रक्रिया रोक दी जाए। इसके बाद 14 जनवरी 2021 को संयुक्त सचिव ने डीपीसी की बैठक स्थगित करने का आदेश जारी कर दिया। बाद में बैठक 2 फरवरी 2021 के लिए निर्धारित की गई, लेकिन उसे भी रोक दिया गया। जिसके बाद वरिष्ठ अधिकारियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। प्रमोशन प्रक्रिया रोके जाने से व्यथित कृषि विभाग के दो सबसे वरिष्ठ ग्रुप-बी अधिकारियों ने राज्य सरकार के निर्णय को चुनौती देते हुए याचिका दायर की। मामला उत्तराखंड लोक सेवा अधिकरण को स्थानांतरित किया गया।

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अधिकरण ने याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए निर्देश दिया कि 31 दिसंबर 2020 की स्थिति के अनुसार उस समय लागू नियमों के तहत प्रमोशन प्रक्रिया पूरी की जाए। राज्य सरकार ने अधिकरण के इस निर्णय को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। राज्य की ओर से तर्क दिया गया कि पदों के पुनर्गठन की प्रक्रिया वर्ष 2002 और 2003 के नोटिफिकेशन से शुरू हो चुकी थी। वर्ष 2010 में ग्रुप-सी पदों के लिए सिंगल विंडो सिस्टम भी लागू किया गया था। एग्रीकल्चर ऑफिसर्स एसोसिएशन की ओर से ग्रुप-बी पदों के लिए भी इसी प्रकार के पुनर्गठन की मांग की गई थी। राज्य की ओर से यह भी कहा गया कि 31 दिसंबर 2020 को मंत्री द्वारा प्रमोशन प्रक्रिया रोकने के आदेश को अधिकरण के समक्ष चुनौती नहीं दी गई थी।

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साथ ही, उत्तर प्रदेश रूल्स ऑफ बिजनेस, 1975 के नियम 3 के तहत मंत्री को इस तरह के प्रतिनिधित्व पर निर्णय लेने का अधिकार था। कोर्ट ने कहा कि प्रमोशन प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी थी और डीपीसी की बैठक भी निर्धारित की जा चुकी थी। खंडपीठ ने कहा कि यदि ऑफिसर्स एसोसिएशन को चल रही प्रमोशन प्रक्रिया पर कोई आपत्ति थी तो उसे निर्धारित प्रशासनिक माध्यम से विभाग के सक्षम अधिकारी के समक्ष अपनी बात रखनी चाहिए थी। सीधे मंत्री के समक्ष जाकर चल रही प्रमोशन प्रक्रिया को रुकवाने का प्रयास उचित नहीं था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रमोशन प्रक्रिया के बीच नियम बदलकर या प्रशासनिक हस्तक्षेप के जरिए पहले से उपलब्ध प्रमोशन के अधिकार को समाप्त नहीं किया जा सकता।

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