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बायोगैस के इस्तेमाल से पर्यावरण में प्राण फूंकने की जुगत

Mon, 03 Apr 2017 12:47 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, हल्द्वानी।
ब्यूरो/अमर उजाला, हल्द्वानी। Updated Mon, 03 Apr 2017 12:47 AM IST
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Use of biogas
बायोगैस का इस्तेमाल - फोटो : अमर उजाला

हल्द्वानी। जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणाम रोकने के लिए जिले की सैकड़ों महिलाओं ने बीड़ा उठाया है। उन्होंने खाना बनाने में लकड़ी की बजाय बायोगैस का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। शहरी प्रदूषण को कम करने के लिए गांवों में कार्बन को क्रेडिट करने की पहल हो रही है। हालांकि फिलहाल छह साल तक इसमें निवेश करने वाली कंपनी कार्बन क्रेडिट को कैश कराएगी, लेकिन उसके  बाद कार्बन क्रेडिट का पैसा सीधे महिला उपभोक्ताओं के खाते में जाएगा। पर्यावरण को सुधारने और संरक्षित करने की दिशा में मुफ्त में बायोगैस प्लांट बनाने और चूल्हा देने का काम गैर सरकारी संस्था सुविधा के जरिये कराया जा रहा है। कुमाऊं में पहली बार नैनीताल जिले से इसकी शुरुआत की गई है। 

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बंगलूरू की कंपनी फेयर क्लाइमेट सर्विसेज और इंडिगो ने संयुक्त रूप से ग्लोबल वार्मिंग के दुष्परिणामों को रोकने के लिए बायोगैस कनेक्शन मुफ्त में देना शुरू किया है। बायोगैस के जरिए कार्बन क्रेडिट का काम उत्तराखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, जम्मू-कश्मीर और मध्य प्रदेश के 550 गांवों में किया जा रहा है। इसी के तहत नैनीताल जिले के गांवों में दो क्यूबिक मीटर क्षमता का बायोगैस प्लांट बनाने और कनेक्शन इंस्टॉलेशन का काम सुविधा के जरिये कराया जा रहा है। सालभर के अंदर जिले के 1441 परिवार की महिलाओं ने एलपीजी और लकड़ी को छोड़कर बायोगैस से खाना बनाना शुरू कर दिया है। इस तरह महिलाओं को चूल्हा फूंकने और लकड़ी काटने से मुक्ति मिल गई है।
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हल्द्वानी से करीब 15 किमी दूर प्रतापपुर और जीतपुर गांव में लगभग शत-प्रतिशत घरों में बायोगैस प्लांट लगाए जा चुके हैं। बायोगैस का इस्तेमाल करने वाली खष्टी देवी, चंपा देवी, भगवती देवी, ममता देवी अब बेहद खुश हैं। वे बताती हैं कि इसके इस्तेमाल से सालभर में कई टन जलावन की लकड़ी बच गई है। अब लकड़ी के लिए न तो जंगल जाना पड़ता है और न ही खरीदना पड़ता है। बायोगैस से हर दिन पांच-छह लोगों वाले परिवार का खाना आराम से बन जाता है। जाड़ों के दिनों में इससे गैस कम बनती है, तब उन्हें लकड़ी या एलपीजी की मदद लेनी पड़ती है। 
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एक आकलन के मुताबिक लकड़ी के बदले बायोगैस के इस्तेमाल से हर परिवार सालाना 6.148 टन कार्बन डाइआक्साइड वायुमंडल में जाने से बचाता है। इस तरह कार्बन क्रेडिट को ओपन मार्केट में सेल किया जाता है। फिलहाल बंगलूरू की कंपनी फेयर क्लाइमेट इस क्षेत्र में निवेश कर रही है और वह ऑटो मोबाइल कंपनियों से टाइअप कर कार्बन क्रेडिट को कैश करा रही है। इसका उद्देश्य खासकर ग्रामीण इलाकों में बायोगैस को बढ़ावा देकर शहरी क्षेत्र में वाहनों, कल-कारखानों और वायुयानों आदि से हो रहे प्रदूषण को कम करना है। 

क्या हैं बायोगैस इस्तेेमाल के फायदे
- हर परिवार को हर साल 5000 रुपये की बचत
- अब सिर पर एलपीजी सिलेंडर ढोना नहीं पड़ता 
- गैस खुली रह जाने पर आग लगाने या किसी अन्य खतरे की आशंका नहीं
- ईंधन के लिए पेड़ काटने की जरूरत नहीं 
- प्लांट बनने के सातवें साल से उपभोक्ता के खाते में 20वें साल तक करीब 8000 रुपये सालाना आएंगे 
- आंखों और स्वास्थ्य के लिए कोई खतरा नहीं 
- सड़ा हुआ गोबर खाद के काम आ जाता है

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