फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttarakhand ›   Nainital News ›   There are fewer creatures here and lose their lives.

यहां पैदा कम होते हैं और जान ज्यादा गंवाते हैं वन्य जीव

Thu, 04 May 2017 01:36 AM IST
अमरनाथ।
अमरनाथ। Updated Thu, 04 May 2017 01:36 AM IST
विज्ञापन
There are fewer creatures here and lose their lives.
कानपुर प्राणि उद्यान

नैनीताल के उच्च स्थलीय प्राणी उद्यान (जू) में 2016 से मार्च 2017 तक महज एक फाउल जंगल रेड पक्षी पैदा हुआ है, जबकि इसी अवधि में विशेेष प्रजातियों के 38 वन्य जीवों ने जान गंवाई है।

विज्ञापन


शेडयूल एक से लेकर चार तक और लुप्तप्राय 203 पशुु-पक्षियों की पिछले 14 साल में मौत हो चुकी है। हल्द्वानी निवासी प्रमोद अग्रवाल गोल्डी की ओर से सूचना अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी से यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है।
विज्ञापन


जानकारी के मुताबिक नैनीताल जू में  मार्च 2015 में नर रायल बंगाल टाइगर की मौत हो गई थी। तब से रानी नाम की मादा रायल बंगाल टाइगर अकेली है। रानी के प्रायोजक उसके खाने के लिए तीन लाख रुपये खर्च के रूप में देते हैं। इससे पहले 2011 में साइबेरियन टाइगर की जान चली गई थी।
विज्ञापन
विज्ञापन


उसके बाद जू में कभी भी दर्र्शक इस प्रजाति के टाइगर के दीदार नहीं कर सके। दुर्लभ की श्रेणी में आने वाले दो हिम तेंदुओं की भी 2009-10 में जान जा चुकी हैं। उसके बाद कभी हिम तेंदुआ जू में नहीं आ पाए। इसी चिड़ियाघर में 20 मार्च 2015 को पाकिस्तान के राष्ट्रीय मारखोर मादा की मौत हो गई। तब से नर मारखोर अकेला है।

तमाम इंतजाम के बाद भी कुछ दिनों के अंतराल में रोज रिंग पाराकीट या प्लम हेडेड पाराकीट और लव बर्ड जोड़ों की मौत हो गई। संभव है कि मेटिंग सीजन में आपसी लड़ाई में इनकी मौत हुई हो। 

इस तरह विभिन्न प्रकार की प्रजातियों की पषु पक्षियों की संख्या 264 अप्रैल-2016 से घटकर अप्रैल 2017 में 233 रह गई है। इस तरह मरने वाले दुर्लभ प्राणियों की तादाद काफी अधिक है, जबकि उनकी जन्म दर बेहद कम है।

यह स्थिति तब है जब जानवरों के अंगीकृत करने से तीन साल में तीन गुना से अधिक धनराशि जू को प्राप्त हो रही है और यहां पर वन्यजीवों के लिए रेस्क्यू सेंटर भी है।

यहां पशुु-पक्षियों की मौत की मुख्य वजह अधिक उम्र है। मेटिंग सीजन में आपसी लड़ाई में भी करीब 10 प्रतिशत पक्षियों की मौत हो जाती है। जोड़े के जरिए इनकी संख्या बढ़ाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय संस्था जिम्स का सहयोग लिया जा रहा है। मारखोर विलुप्तप्राय की श्रेणी में आता है। इसका जोड़ा बनानेे के लिए दार्जिलिंग जू से संपर्क साधा गया है। जू में पशु-पक्षियों की प्रजनन दर काफी कम के पीछे खुला वातावरण न होना भी बड़ा कारण है।
योगेश भारद्वाज, जू चिकित्सक


उत्तर भारत में अनोखा है यह चिड़ियाघर

उत्तर भारत का अकेला उच्च स्थलीय प्राणी उद्यान है जो लगभग 2100 मीटर की उंचाई पर शेर का डंडा हिल में स्थित है। 1995 में लोगों के लिए इसे खोला गया था। इसे सेंट्रल जू अथारिटी की सदस्यता मिली हुई है।


करीब 11 एकड़ में यह प्राणी उद्यान फैला हुआ है। पिछले साल रेड पांडा के भी दो बच्चे हुए थे। जू में तीन माह पहले बेतालघाट से एक घायल टाइगर को लाया गया है और इस टाइगर का नाम राजा या बेताल रखने पर विचार किया जा रहा है।

साल दर साल बढ़ता मौत का सिलसिला
2013- 8
2014- 23
2015- 27
2016- 32
2017 (22 मार्च तक)- 6

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed