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Nainital News: हाथी कॉरिडोर में विकास का पहिया, थम रहे गजराज के कदम
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हल्द्वानी। शहरीकरण और सिकुड़ते जंगलों के कारण वर्तमान में सबसे बड़ा संकट वन्यजीवों के स्वच्छंद विचरण पर आ गया है। ऐसे में नैनीताल और ऊधमसिंह नगर जिले में हाथियों के कॉरिडोर विलुप्त हो रहे हैं। इस वजह से हाथी आबादी क्षेत्र में आ रहे है।
उत्तराखंड से पूर्वी नेपाल के मधेश क्षेत्र हाथी कॉरिडोर वर्तमान में विकास की इस दौड़ में अपना अस्तित्व खोने लगा है। हाल के वर्षों में कुमाऊं के टांडा, लालकुआं और गौला के साथ ही सितारगंज रेंज किलपुरा, सुरई, खटीमा हाथी कॉरिडोर भी अपने मूल अस्तित्व को लेकर जूझ रहे हैं। जब गजराज के रास्ते ब्लाक होने लगे तो उन्होंने मार्ग बदल लिया। पिछले दिनों नैनीताल के गांवों में हाथियों के उत्पात के बाद अब एक बार फिर हाथी कॉरिडोर को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
कुमाऊं क्षेत्र में हाथी कॉरिडोर का ज्यादा भाग तराई पूर्वी वन प्रभाग के क्षेत्र से होकर जाता है। इसमें टांडा, लालकुआं और गौला रेंज हैं जिसका कुछ हिस्सा तराई केंद्रीय प्रभाग के अंतर्गत भी है। इसके अलावा किलपुरा, सुरई और खटीमा कॉरिडोर के जरिये भी कई साल पहले हाथियों के झुंड विचरण करते थे। वन्य जीव विशेषज्ञों के अनुसार यही कॉरिडोर, लखीमपुर से होते हुए पूर्वी नेपाल के मधेश क्षेत्र तक जाता था। इस रास्ते पर सड़कों का जाल बिछा तो डर और रास्ते ब्लाक होने की वजह से हाथियों का आना-जाना कम हो गया। बता दें कि हाथी कॉरिडोर यानी एक ऐसा गलियारा या रास्ता जहां बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के हाथी एक जगह से दूसरी जगह विचरण करते हैं।
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कैमरा ट्रैप बताएगा कितने हाथी गुजरे
तराई पूर्वी के टांडा-लालकुआं हाथी कॉरिडोर में वन विभाग ने हाथियों के मूवमेंट को ट्रैप करने के लिए कैमरे लगाए हैं। तकरीबन डेढ़ माह पहले लगे कैमरे की अब फुटेज विभाग मंगाने वाला है। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के साथ मिलकर वन विभाग इस कॉरिडोर में हाथियों का मूवमेंट मिलने के बाद इसके संरक्षण का कार्य करेगा।
यह घटनाएं हुई थीं
नैनीताल के पटवाडांगर के आसपास के जंगल में हाथियों की आवाज सुनने के बाद लोगों में भय का माहौल अभी भी बना है। 23 जुलाई को देवीधुरा ग्राम पंचायत के पापड़ी तोक में हाथियों का झुंड दिखा। 24 जुलाई को बाना गांव में उत्पात भी मचाया। इससे पहले पापड़ी और बोहरागांव में भी जंगली हाथियों ने उत्पात मचाया था जिससे वहां भय का माहौल था।
कोट
हाथी कॉरिडोर को लेकर कार्य किया जा रहा है। इसी क्रम में ट्रैप कैमरा लगाए गए हैं। जल्द ही अन्य रूट पर भी ट्रैप कैमरा लगाए जाने की योजना बनाई जाएगी।
हिमांशु बागरी, डीएफओ तराई पूर्वी
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उत्तराखंड से पूर्वी नेपाल के मधेश क्षेत्र हाथी कॉरिडोर वर्तमान में विकास की इस दौड़ में अपना अस्तित्व खोने लगा है। हाल के वर्षों में कुमाऊं के टांडा, लालकुआं और गौला के साथ ही सितारगंज रेंज किलपुरा, सुरई, खटीमा हाथी कॉरिडोर भी अपने मूल अस्तित्व को लेकर जूझ रहे हैं। जब गजराज के रास्ते ब्लाक होने लगे तो उन्होंने मार्ग बदल लिया। पिछले दिनों नैनीताल के गांवों में हाथियों के उत्पात के बाद अब एक बार फिर हाथी कॉरिडोर को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
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कुमाऊं क्षेत्र में हाथी कॉरिडोर का ज्यादा भाग तराई पूर्वी वन प्रभाग के क्षेत्र से होकर जाता है। इसमें टांडा, लालकुआं और गौला रेंज हैं जिसका कुछ हिस्सा तराई केंद्रीय प्रभाग के अंतर्गत भी है। इसके अलावा किलपुरा, सुरई और खटीमा कॉरिडोर के जरिये भी कई साल पहले हाथियों के झुंड विचरण करते थे। वन्य जीव विशेषज्ञों के अनुसार यही कॉरिडोर, लखीमपुर से होते हुए पूर्वी नेपाल के मधेश क्षेत्र तक जाता था। इस रास्ते पर सड़कों का जाल बिछा तो डर और रास्ते ब्लाक होने की वजह से हाथियों का आना-जाना कम हो गया। बता दें कि हाथी कॉरिडोर यानी एक ऐसा गलियारा या रास्ता जहां बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के हाथी एक जगह से दूसरी जगह विचरण करते हैं।
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कैमरा ट्रैप बताएगा कितने हाथी गुजरे
तराई पूर्वी के टांडा-लालकुआं हाथी कॉरिडोर में वन विभाग ने हाथियों के मूवमेंट को ट्रैप करने के लिए कैमरे लगाए हैं। तकरीबन डेढ़ माह पहले लगे कैमरे की अब फुटेज विभाग मंगाने वाला है। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के साथ मिलकर वन विभाग इस कॉरिडोर में हाथियों का मूवमेंट मिलने के बाद इसके संरक्षण का कार्य करेगा।
यह घटनाएं हुई थीं
नैनीताल के पटवाडांगर के आसपास के जंगल में हाथियों की आवाज सुनने के बाद लोगों में भय का माहौल अभी भी बना है। 23 जुलाई को देवीधुरा ग्राम पंचायत के पापड़ी तोक में हाथियों का झुंड दिखा। 24 जुलाई को बाना गांव में उत्पात भी मचाया। इससे पहले पापड़ी और बोहरागांव में भी जंगली हाथियों ने उत्पात मचाया था जिससे वहां भय का माहौल था।
कोट
हाथी कॉरिडोर को लेकर कार्य किया जा रहा है। इसी क्रम में ट्रैप कैमरा लगाए गए हैं। जल्द ही अन्य रूट पर भी ट्रैप कैमरा लगाए जाने की योजना बनाई जाएगी।
हिमांशु बागरी, डीएफओ तराई पूर्वी