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Nainital News: व्यवस्था का मकड़जाल... नहीं मिला एक धेला, भटका 36 साल

Haldwani Bureau हल्द्वानी ब्यूरो
Updated Tue, 09 Sep 2025 02:43 AM IST
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The web of the system... did not get a penny, wandered for 36 years
गिरीश रंजन तिवारी
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नैनीताल। तंत्र की निष्ठुरता और व्यवस्था के मकड़जाल ने एक मासूम बेटे से उसके हक का छोटा सा सहारा भी छीन लिया। एक सरकारी श्रमिक ने ड्यूटी निभाते हुए अपनी जान गंवा दी। विभाग ने कहा कि परिवार को मुआवजा मिलेगा लेकिन 36 बरस बीतने के बाद भी बेटे को एक धेला तक नसीब नहीं हुआ।

यह कहानी सिर्फ एक परिवार की पीड़ा नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की बेरुखी का आईना है जो अपने ही कर्मियों की शहादत को भूल गई। यह हृदय विदारक घटना सुनील कुमार शर्मा के परिवार की है। एक निर्धन, नियमित सरकारी श्रमिक के सेवा के दौरान करंट लगने से मौत के बाद सरकारी मुआवजे की घोषणा के बावजूद उसके पुत्र को इसके लिए दर दर भटकना पड़ा लेकिन 36 साल बाद भी उसे एक धेला नहीं मिला। हार कर जब वह लोक अदालत पहुंचा तब तक मामला समयसीमा पार कर गया और उसे निराशा ही हाथ लगी। मामले में सुनील कुमार शर्मा के पिता अशोक कुमार शर्मा वर्ष 1989 में हरिद्वार टेलीफोन एक्सचेंज में कार्यरत थे। लोहे के पोल पर कार्य करते वह हुए बिजली के करंट की चपेट में आ गए और उनकी मौत हो गई थी। उस समय सुनील की उम्र केवल पांच वर्ष की थी। 19 अक्तूबर 1995 को मृतक आश्रितों को 10 हजार रुपये का मुआवजा स्वीकृत करने का पत्र जारी किया गया लेकिन राशि कभी अदा नहीं की गई। संवाद
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दर दर भटके परिजन, लेकिन व्यवस्था रही पत्थर-दिल...

हादसे के वक्त मृतक के पुत्र के बहुत कम उम्र का होने के कारण पहले मृतक के भाई ने और बाद में वयस्क होने पर सुनील ने कई बार विभाग से पत्राचार किया। विभाग ने अपनी ही घोषणा के बावजूद उसे मात्र दस हजार रुपए की राशि भी नहीं दी। सुनील ने वर्ष 2007 में विभाग को रिमाइंडर दिया। 2009 में आरटीआई से जानकारी मांगी और 2022 में विद्युत विभाग को कानूनी नोटिस भी भेजा गया। आखिर में मामला स्थायी लोक अदालत हरिद्वार पहुंचा जहां 5 जून 2023 को दावा समय-सीमा से बाहर होने के कारण खारिज हो गया। लोक अदालत के निर्णय को याची ने हाई कोर्ट में चुनौती दी।
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कोर्ट ने जताई पूरी सहानुभूति लेकिन अब कानूनी समय सीमा हो चुकी थी पार

नैनीताल। हाईकोर्ट में न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की एकलपीठ के समक्ष लोक अदालत के निर्णय की समीक्षा हुई। कोर्ट ने कहा कि 1989 की घटना के बाद लोक अदालत में वर्ष 2022 में दावा किया गया जो कि 30 से अधिक वर्षों की देरी है। ऐसे मामलों में कानून में समयसीमा निर्धारित है। इस मामले में अत्यधिक समसीमा पार हो चुकी है। कोर्ट ने कहा कि याची के प्रति भरपूर सहानुभूति है लेकिन सहानुभूति या समानता के आधार पर राहत नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने कहा कि इस आधार पर स्थायी लोक अदालत का आदेश विधिसम्मत है और उसमें कोई त्रुटि या कानूनी चूक नहीं है। संवाद
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