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पिथौरागढ़ में बड़ुवा के पौध से बनाते थे कागज
कैलाश पाठक/अमर उजाला,नैनीताल
Updated Wed, 04 Feb 2015 02:15 AM IST
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जब कागज की कल्पना करना मुमकिन नहीं था। लोग भोजपत्र, ताड़ वृक्ष, अंग्रू के पेड़ से कागज का निर्माण करते थे। लेकिन उसी दौर में पिथौरागढ़ जिले के कनालीछीना ब्लाक के सतगढ़ गांव में बड़ुवा का पौध हुआ करता था। सतगढ़ के लोगों का एकमात्र काम सिर्फ कागज बनाना था।
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बड़ी मात्रा में इस पौध से कागज तैयार कर वह थल मेले में ले जाते थे और वहां कुंडली बनाने वाले पंडित इसे खरीदते थे। यह कहना है कि हिमालयन सोसायटी फार हेरिटेज एंड आर्ट कंजरवेशन के निदेशक अनुपम साह का। यहां पांडुलिपि संरक्षण कार्यशाला में प्रशिक्षुओं को प्रशिक्षण देने पहुंचे श्री साह कहते हैं कि बड़ुवा का पौध बड़े पेड़ों की जड़ में पैदा होता है।
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इससे पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं होता। हमारे मनीषियों ने पर्यावरण संरक्षण के मद्देनजर बड़ुवा के पौध का कागज बनाना शुरू किया। सतगढ़ गांव में इस पौध की प्रचुरता के चलते लोग सालभर कागज बनाते थे और थल मेले में बड़ी मात्रा में इसकी बिक्री होती थी।
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तवांग में चल रहा शुग से कागज निकालने का काम
हिमालयन सोसायटी फार हैरिटेज एंड आर्ट कंजरवेशन के निदेशक अनुपम साह ने बताया कि भारत-चीन की सीमा से सटे तवांग गांव में शुग के पेड़ की खाल से कागज बनाने का काम चल रहा है। उन्होंने बताया कि 11 हजार फीट की ऊंचाई पर पाए जाने वाले शुग की खाल निकालकर पानी में उबालते हैं। इसे छानने के बाद ट्रे में रखकर सुखा देते हैं और कागज तैयार हो जाता है।