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Nainital News: पहाड़ में समय से पहले गूंज उठा अबाबील के चहकने का संगीत
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भवाली (नैनीताल)। जैसे ही पर्वतीय घाटियों में समय से पहले गर्मियों की हल्की आहट आई तो दक्षिण अफ्रीका से आने वाली अबाबील चिड़ियां अपने पारंपरिक समय से डेढ़ माह पहले ही पहाड़ों में आना शुरू हो गई है। इस बार बर्फबारी और बारिश न होने से तापमान में बढ़ोतरी ने उनका प्रवास तेजी से यहां हो रहा है। घाटियों में उनकी चहचहाहट ने एक अलग उल्लास फैला दिया है।
वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार अबाबील स्वैलो चिड़िया उत्तराखंड में धनपुतई या गौताई के नाम से जानी जाती है। इस बार चिड़िया फरवरी में ही घरों, दुकानों में घोंसले बनाने में व्यस्त है। भवाली सेनिटोरियम नगर के व्यापारी राजीव पांडे ने बताया कि उनकी दुकान में भी अबाबील ने घोंसला बना लिया है। पांडे ने कहा कि समय से पहले ही प्रवासी चिड़िया पहाड़ों में पहुंचने लगी है। भवाली के वन क्षेत्राधिकारी विजय मेलकानी ने बताया कि इस बार मौसम के अनुकूल काफल और बुंराश भी समय से पहले खिलने लगे हैं। इससे प्रवासी पक्षियों को भोजन की सुविधा मिली और उनका आगमन तेज हुआ। अमूमन अप्रैल के दूसरे सप्ताह में अबाबील अंडे देती है और सितंबर तक अपने मूल स्थान लौट जाती है। उन्होंने कहा कि इस बार बर्फबारी नहीं होने से तापमान में बढ़ोतरी हुई है। इसके चलते प्रवासी चिड़ियां समय से पहले आ गई हैं। मेलकानी ने बताया कि इस चिड़िया का स्वभाव बेहद सरल होता है और आसानी से पकड़ में आ जाती है। वनकर्मियों से इस पर नजर रखने को कहा है ताकि इसका अवैध शिकार न हो सके। संवाद
ऐसे बनाती है अपना घोंसला
ये पक्षी गीली मिट्टी, कपास और मुंह की लार से घोंसला बनाते हैं। इनके हौसले की मजबूती का अंदाज आप इस बात से लगा सकते हैं कि जिस दीवार पर ये घोसला बनाते हैं, उसका प्लास्टर भले उखड़ जाता है लेकिन घोसले को नुकसान नहीं पहुंचता। यह पक्षी भारत भ्रमण पर 9 महीने के लिए निकलते हैं। दक्षिण अफ्रीका की इस चिड़िया की 75 प्रजातियां हैं।
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वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार अबाबील स्वैलो चिड़िया उत्तराखंड में धनपुतई या गौताई के नाम से जानी जाती है। इस बार चिड़िया फरवरी में ही घरों, दुकानों में घोंसले बनाने में व्यस्त है। भवाली सेनिटोरियम नगर के व्यापारी राजीव पांडे ने बताया कि उनकी दुकान में भी अबाबील ने घोंसला बना लिया है। पांडे ने कहा कि समय से पहले ही प्रवासी चिड़िया पहाड़ों में पहुंचने लगी है। भवाली के वन क्षेत्राधिकारी विजय मेलकानी ने बताया कि इस बार मौसम के अनुकूल काफल और बुंराश भी समय से पहले खिलने लगे हैं। इससे प्रवासी पक्षियों को भोजन की सुविधा मिली और उनका आगमन तेज हुआ। अमूमन अप्रैल के दूसरे सप्ताह में अबाबील अंडे देती है और सितंबर तक अपने मूल स्थान लौट जाती है। उन्होंने कहा कि इस बार बर्फबारी नहीं होने से तापमान में बढ़ोतरी हुई है। इसके चलते प्रवासी चिड़ियां समय से पहले आ गई हैं। मेलकानी ने बताया कि इस चिड़िया का स्वभाव बेहद सरल होता है और आसानी से पकड़ में आ जाती है। वनकर्मियों से इस पर नजर रखने को कहा है ताकि इसका अवैध शिकार न हो सके। संवाद
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ऐसे बनाती है अपना घोंसला
ये पक्षी गीली मिट्टी, कपास और मुंह की लार से घोंसला बनाते हैं। इनके हौसले की मजबूती का अंदाज आप इस बात से लगा सकते हैं कि जिस दीवार पर ये घोसला बनाते हैं, उसका प्लास्टर भले उखड़ जाता है लेकिन घोसले को नुकसान नहीं पहुंचता। यह पक्षी भारत भ्रमण पर 9 महीने के लिए निकलते हैं। दक्षिण अफ्रीका की इस चिड़िया की 75 प्रजातियां हैं।
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