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Uk: नैनीताल में दिखा साल का पहला सुपरमून, चांद दिखा ज्यादा बड़ा और चमकीला
Sun, 04 Jan 2026 11:10 AM IST
गायत्री जोशी
अमर उजाला नेटवर्क, नैनीताल
अमर उजाला नेटवर्क, नैनीताल
Published by: गायत्री जोशी
Updated Sun, 04 Jan 2026 11:10 AM IST
सार
नैनीताल में 3 जनवरी की रात को इस साल का पहला सुपरमून, आकाश में ज्यादा बड़ा और अत्यधिक चमकीला नजर आया।
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सांकेतिक तस्वीर।
विस्तार
नैनीताल में 3 जनवरी की रात को इस साल का पहला सुपरमून, आकाश में ज्यादा बड़ा और अत्यधिक चमकीला नजर आया। नए साल की शुरुआत खगोलीय दृष्टि से खास रही जब 3 जनवरी की रात आकाश में साल का पहला सुपरमून नजर आया।
पूर्णिमा का यह चांद सामान्य पूर्णिमा की तुलना में आकार में अधिक बड़ा था जिससे आसमान एक अलग ही आभा से जगमगा उठा। सुपरमून तब बनता है जब पूर्णिमा के अवसर पर चांद अपनी कक्षा में पृथ्वी के सबसे नजदीकी बिंदु (पेरीजी) के आसपास होता है।
इस कारण चांद पृथ्वी से अपेक्षाकृत कम दूरी पर होता है। 3 जनवरी को चांद पृथ्वी से अपनी न्यूनतम दूरी 3 लाख 62 हजार किमी पर था। इस वजह से यह सामान्य पूर्णिमा की अपेक्षा लगभग 14 प्रतिशत बड़ा और 30 प्रतिशत ज्यादा चमकदार नजर आया।
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वुल्फमून और आइसमून हैं इसके नाम
3 जनवरी को दिखाई देने वाली यह पूर्णिमा अलग-अलग संस्कृतियों और परंपराओं में विभिन्न नामों से जानी जाती है। इन नामों के पीछे मौसम, प्रकृति और मानवीय जीवन से जुड़े अनुभव कारण बने हैं। वुल्फमून इस पूर्णिमा का सबसे प्रचलित नाम है। उत्तर अमेरिका और यूरोप में जनवरी की कड़ाके की ठंड के दौरान जंगलों के पास रात में भेड़ियों (वुल्फ) के बहुत से झुंड बाहर निकलते थे। ठंड और भोजन की कमी के कारण भेड़ियों के रोने (हाउलिंग) की आवाजें अधिक सुनाई देती थीं। इस वजह से जनवरी की पूर्णिमा को वुल्फमून कहा जाने लगा। उत्तरी गोलार्ध में जनवरी सबसे ठंडा महीना होता है। अनेक स्थानों पर झीलें, नदियां और जलाशय बर्फ से जम जाते हैं। इस कारण इसे आइसमून भी कहा जाता है।
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पूर्णिमा का यह चांद सामान्य पूर्णिमा की तुलना में आकार में अधिक बड़ा था जिससे आसमान एक अलग ही आभा से जगमगा उठा। सुपरमून तब बनता है जब पूर्णिमा के अवसर पर चांद अपनी कक्षा में पृथ्वी के सबसे नजदीकी बिंदु (पेरीजी) के आसपास होता है।
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इस कारण चांद पृथ्वी से अपेक्षाकृत कम दूरी पर होता है। 3 जनवरी को चांद पृथ्वी से अपनी न्यूनतम दूरी 3 लाख 62 हजार किमी पर था। इस वजह से यह सामान्य पूर्णिमा की अपेक्षा लगभग 14 प्रतिशत बड़ा और 30 प्रतिशत ज्यादा चमकदार नजर आया।
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वुल्फमून और आइसमून हैं इसके नाम
3 जनवरी को दिखाई देने वाली यह पूर्णिमा अलग-अलग संस्कृतियों और परंपराओं में विभिन्न नामों से जानी जाती है। इन नामों के पीछे मौसम, प्रकृति और मानवीय जीवन से जुड़े अनुभव कारण बने हैं। वुल्फमून इस पूर्णिमा का सबसे प्रचलित नाम है। उत्तर अमेरिका और यूरोप में जनवरी की कड़ाके की ठंड के दौरान जंगलों के पास रात में भेड़ियों (वुल्फ) के बहुत से झुंड बाहर निकलते थे। ठंड और भोजन की कमी के कारण भेड़ियों के रोने (हाउलिंग) की आवाजें अधिक सुनाई देती थीं। इस वजह से जनवरी की पूर्णिमा को वुल्फमून कहा जाने लगा। उत्तरी गोलार्ध में जनवरी सबसे ठंडा महीना होता है। अनेक स्थानों पर झीलें, नदियां और जलाशय बर्फ से जम जाते हैं। इस कारण इसे आइसमून भी कहा जाता है।