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Haldwani News: दक्षित के रास्ते विदेश जा रहा उत्तराखंड का सागौन, ब्रिटेन और दूसरे देशों को किया जा रहा निर्यात

Fri, 30 May 2025 02:12 PM IST
हीरा मेहरा अमर उजाला नेटवर्क, हल्द्वानी
अमर उजाला नेटवर्क, हल्द्वानी Published by: हीरा मेहरा Updated Fri, 30 May 2025 02:12 PM IST
सार

फर्नीचर की सिरमौर बनी सागौन की लकड़ी अब दक्षिण के राज्यों के रास्ते ब्रिटेन व अन्य देशों को निर्यात हो रही है। गर्म जलवायु वाले दक्षिण के मुकाबले गुणवत्ता के मामले में उत्तराखंड का सागौन कमजोर है, इसलिए वहीं विदेशों की निगाह रहती है।

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Teak wood is now being exported to Britain and other countries via the southern states from uttarakhand
सागौन

विस्तार

टिकाऊपन के साथ ही कई अन्य विशेषताओं के कारण फर्नीचर की सिरमौर बनी सागौन की लकड़ी अब दक्षिण के राज्यों के रास्ते ब्रिटेन व अन्य देशों को निर्यात हो रही है। गर्म जलवायु वाले दक्षिण के मुकाबले गुणवत्ता के मामले में उत्तराखंड का सागौन कमजोर है, इसलिए वहीं विदेशों की निगाह रहती है। यहां का सागौन सस्ता भी है। इसी का फायदा उठाकर वहां की कंपनियां यहां से सागौन खरीदकर ले जा रही हैं।

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उत्तराखंड और दक्षिण भारत के सागौन के रेट में डेढ़ से दोगुने का अंतर है। लकड़ी देखने में समान होने के कारण उसकी पहचान कर पाना मुश्किल होता है। कोई जानकार ही बता सकता है। इसलिए यहां के सागौन की विदेशों में आसानी से खपत हो जाती है। वन विकास निगम के डिपो से पिछले दिनों सागौन की सबसे ज्यादा खरीदारी दक्षिण भारत की ही कंपनियों ने की। मई में 16 हजार घनमीटर से ज्यादा लकड़ी की बिक्री हुई। अब भी डिपो में कुल लकड़ियों का 40 से 60 प्रतिशत सागौन का ही हिस्सा है। सागौन की एक खराबी भी है, यह अपने इर्द-गिर्द अन्य प्रजाति के पेड़ों को नहीं पनपने देता। इस कारण तराई में इसका दायरा कम करने के लिए सागौन के पेड़ ही सबसे ज्यादा काटे जा रहे हैं। ऐसे में डिपो भरे हैं और दक्षिण भारत के ठेका कंपनियों की मांग उत्तराखंड पूरी कर दे रहा है।

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साउथ की 13 ठेका फर्में ले रहीं नीलामी में हिस्सा
आंध्र प्रदेश की पांच, कर्नाटक की तीन, पश्चिम बंगाल व गुजरात की दो-दो और तेलंगाना व तमिलनाडु की एक-एक कंपनी उत्तराखंड से सागौन की लकड़ियों की वन निगम डिपो की ऑनलाइन नीलामी बोली में लगातार हिस्सा ले रही हैं।

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उत्तर व मध्य भारत में खैर और यूकेलिप्टस की ही मांग ज्यादा
उत्तर प्रदेश की 71, हरियाणा की 21, राजस्थान की तीन, मध्य प्रदेश की 17, हिमाचल प्रदेश की पांच, पंजाब और जम्मू-कश्मीर की दो-दो कंपनियां अपने एजेंट के माध्यम से ऑनलाइन बोली लगाती हैं। ये कंपनियां आमतौर पर खैर और यूकेलिप्टस की ही खरीदारी कर रही हैं। खैर का कत्थे नाने में ज्यादा इस्तेमाल होता है। गुटका बनाने वाली कंपनियां इसकी ज्यादा खरीदारी करती हैं। तराई के रामनगर, टनकपुर, हल्द्वानी में खैर के पेड़ सबसे ज्यादा हैं।

141 प्रतिशत पर बिक रही खैर, 211 पर यूकेलिप्टस
ऑनलाइन बोली में लकड़ियों के स्लॉट का रेट तय हो जाता है। नीलामी में खैर 130 से 141 प्रतिशत ज्यादा रेट की बोली लगी। यूकेलिप्टस 211 प्रतिशत ज्यादा तक पहुंच गई। सागौन भी अपने तय रेट से 130 प्रतिशत ज्यादा दाम में बिका।

सागौन खरीदने में दक्षिण भारत के पंजीकृत ठेकेदार व कंपनियां बोली लगा रही हैं। सागौन सबसे ज्यादा वहीं के लिए जा रहा है। तीनों प्रजातियों की लकड़ियां इस बार तय रेट से 120 से 141 प्रतिशत ज्यादा दर में बिकी हैं। दक्षिण भारत में पाया जाने वाला सागौन यहां के मुकाबले बेहतर गुणवत्ता वाला होता है। ऐसे में वहीं की ज्यादा मांग होती है। इस समय दक्षिण भारत में कटाई नहीं चल रही है। ऐसे में यहां से ज्यादा मात्रा में खरीदारी हो रही है। -उपेंद्र बर्तवाल, डीएलएम, हल्द्वानी वन विकास निगम

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