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Nainital News: बीएएमएस छात्रा को इंटर्नशिप से रोकने का आदेश रद्द
Sat, 19 Aug 2023 02:19 AM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, नैनीताल
संवाद न्यूज एजेंसी, नैनीताल
Updated Sat, 19 Aug 2023 02:19 AM IST
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नैनीताल। हाईकोर्ट ने उत्तराखंड आयुर्वेदिक विश्वविद्यालय की ओर से बीएएमएस की एक छात्रा को इंटर्नशिप से रोकने के आदेश को रद्द कर दिया है।
न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी की एकलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मदरहुड आयुर्वेदिक कॉलेज रुड़की की छात्रा मिस सोनम ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि 2017 में शिवओम कुमार चौधरी ने कॉलेज में बीएएमएस छात्र के रूप में प्रवेश लिया लेकिन 2018 में उनका चयन एमबीबीएस में हो गया और उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया। इस रिक्त सीट के सापेक्ष याचिकाकर्ता ने मैनेजमेंट कोटे से कॉलेज में प्रवेश लिया लेकिन एक साल तक उसका नाम और नामांकन नंबर शिवओम कुमार चौधरी के नाम से रहा। बार-बार प्रत्यावेदन देने के बाद उनके नाम को सही किया गया। चार साल की पढ़ाई के बाद विश्वविद्यालय ने उनकी मार्कशीट और नामांकन को गलत ठहराते हुए उन्हें इंटर्नशिप से रोक दिया। इस आदेश को उन्होंने कोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने आयुर्वेदिक विश्वविद्यालय के इस आदेश को गलत ठहराते हुए उसे रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा है कि विश्वविद्यालय को प्रवेश के दिन से ही इन तथ्यों की जांच करनी चाहिए थी। चार साल की पढ़ाई व अंक पत्र जारी करने के बाद विश्वविद्यालय को किसी छात्र के भविष्य से इस तरह के व्यवहार की अपेक्षा नहीं की जा सकती।
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न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी की एकलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मदरहुड आयुर्वेदिक कॉलेज रुड़की की छात्रा मिस सोनम ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि 2017 में शिवओम कुमार चौधरी ने कॉलेज में बीएएमएस छात्र के रूप में प्रवेश लिया लेकिन 2018 में उनका चयन एमबीबीएस में हो गया और उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया। इस रिक्त सीट के सापेक्ष याचिकाकर्ता ने मैनेजमेंट कोटे से कॉलेज में प्रवेश लिया लेकिन एक साल तक उसका नाम और नामांकन नंबर शिवओम कुमार चौधरी के नाम से रहा। बार-बार प्रत्यावेदन देने के बाद उनके नाम को सही किया गया। चार साल की पढ़ाई के बाद विश्वविद्यालय ने उनकी मार्कशीट और नामांकन को गलत ठहराते हुए उन्हें इंटर्नशिप से रोक दिया। इस आदेश को उन्होंने कोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने आयुर्वेदिक विश्वविद्यालय के इस आदेश को गलत ठहराते हुए उसे रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा है कि विश्वविद्यालय को प्रवेश के दिन से ही इन तथ्यों की जांच करनी चाहिए थी। चार साल की पढ़ाई व अंक पत्र जारी करने के बाद विश्वविद्यालय को किसी छात्र के भविष्य से इस तरह के व्यवहार की अपेक्षा नहीं की जा सकती।