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Hindi News ›   Uttarakhand ›   Almora News ›   Surendra Koli returned to Mangrukhal after being acquitted by the Supreme Court in the Nithari case

निठारी कांड: सुरेंद्र कोली के परिवार की अनकही दर्दनाक कहानी, जिसे सहना पड़ा तानों का दंश; पढ़ें पूरी कहानी

Sat, 19 Sep 2026 12:14 PM IST
Heera मोहित कुमार गोयल
मोहित कुमार गोयल Published by: Heera Updated Sat, 19 Sep 2026 12:14 PM IST
सार

निठारी कांड में सुरेंद्र कोली का नाम 2006 में सामने आने के बाद उसके परिवार की मुश्किलें बढ़ गईं। मां, पत्नी और बच्चों को लोगों के तानों का सामना करना पड़ा और बच्चों के स्कूल में दाखिले में भी परेशानी आई।

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Surendra Koli returned to Mangrukhal after being acquitted by the Supreme Court in the Nithari case
यहीं मिला था निठारी कांड के आरोपी सुरेंद्र का शव - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

 

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देश के चर्चित निठारी कांड से चर्चा में रहे अल्मोड़ा के सुरेंद्र कोली ने दोषमुक्त होने के करीब 10 माह बाद हरिद्वार में आत्महत्या कर ली। सुप्रीम कोर्ट से बरी किए जाने के बाद अपने गृहक्षेत्र मंगरुखाल आया था। इन दिनों वह हरिद्वार में सामान्य जीवन जीने की कोशिश कर रहा था।

अल्मोड़ा जिले के स्याल्दे ब्लॉक के मंगरुखाल गांव निवासी सुरेंद्र करीब 21 साल जेल में रहा। निठारी कांड से जुड़े अंतिम लंबित मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 11 नवंबर 2025 को उसकी दोषसिद्धि रद्द करते हुए उसे बरी कर दिया था। इसके साथ ही उसके खिलाफ निठारी कांड से जुड़े सभी आपराधिक मामलों का अंत हो गया था। रिहाई के बाद सुरेंद्र हरिद्वार में रहकर चाय की दुकान चला रहा था और सामान्य जीवन शुरू करने का प्रयास कर रहा था। इसी बीच उसकी मौत हो गई।

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दोषमुक्त होने के बाद सुरेंद्र इसी साल जून में आखिरी बार अपने पैतृक गांव मंगरुखाल आया था। परिवार ने गांव में पूजा-पाठ का कार्यक्रम रखा था जिसमें चारों भाई शामिल हुए थे। सुरेंद्र पूजा से करीब दो दिन पहले गांव पहुंच गया था। अन्य भाई कार्यक्रम के समय पहुंचे। ग्रामीणों के अनुसार इस दौरान सुरेंद्र का सभी से सामान्य व्यवहार रहा। उसने ग्रामीणों से बातचीत भी की और किसी ने उसका विरोध नहीं किया। गांव का पुश्तैनी मकान अब खंडहर में तब्दील हो चुका है। पूजा के दौरान सुरेंद्र अपने छोटे भाई आनंद कोली के बनाए घर में ठहरा था।

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सुरेंद्र की मौत की खबर मिलने के बाद उसके भाई दिल्ली से हरिद्वार रवाना हो गए। परिवार के मददगार पूर्व जिला पंचायत सदस्य नारायण सिंह रावत भी अपने साथी विशन शर्मा के साथ हरिद्वार के लिए रवाना हुए। भाई चंदन राम कोली ने बताया कि हरिद्वार पहुंचने के बाद ही आगे की कार्रवाई के संबंध में निर्णय लिया जाएगा।

आरोप: दुकान मालिक के दबाव के कारण की सुरेंद्र कोली ने आत्महत्या
सुरेंद्र कोली की कानूनी मदद करने वाले सल्ट के पूर्व जिला पंचायत सदस्य नारायण सिंह रावत ने दुकान मालिक पर उसे परेशान करने और टॉर्चर करने का आरोप लगाया है। नारायण रावत ने बताया कि वह लगातार सुरेंद्र के संपर्क में थे। बृहस्पतिवार शाम को भी फोन पर उनकी सुरेंद्र से बात हुई थी। सुरेंद्र ने बताया था कि चाय की दुकान का मालिक उसे लगातार परेशान कर रहा है और किराया बढ़ाने की बात कह रहा है। रावत ने बताया कि सुरेंद्र आर्थिक दिक्कतों से भी जूझ रहा था। इसी कारण उन्होंने उसे 25 हजार रुपये की आर्थिक मदद भी की थी।

चार भाइयों में दूसरे नंबर पर था सुरेंद्र
सुरेंद्र चार भाइयों में दूसरे नंबर का था। उसके पिता शाकरू राम और मां कुंती देवी थीं। बड़ा भाई चंदन राम कोली और छोटा भाई हरीश कोली दिल्ली में रहते हैं जबकि सबसे छोटा भाई आनंद राम कोली परिवार के साथ मासी में रहता है। कुछ समय गांव में रहने के बाद सुरेंद्र रोजगार की तलाश में दिल्ली चला गया था।

सुरेंद्र की शादी शांति देवी से हुई थी। निठारी कांड में नाम आने और जेल जाने के समय उसकी एक बेटी थी जबकि बेटा मां के गर्भ में था। परिवार के अनुसार उसके जेल जाने के बाद गांव में परिवार को सामाजिक और आर्थिक मुश्किलों का सामना करना पड़ा।

मां और परिवार को झेलना पड़ा सामाजिक दबाव
ग्रामीणों के अनुसार वर्ष 2006 में निठारी कांड में सुरेंद्र का नाम सामने आने के बाद परिवार की मुश्किलें बढ़ गईं। उसकी मां, पत्नी और बच्चों को लोगों के तानों का सामना करना पड़ा। बच्चों के स्कूल में दाखिले में भी परेशानी आने की बात परिवार ने बताई। परिवार करीब आठ साल तक गांव में रहा। वर्ष 2014 में सुरेंद्र को फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद उसकी पत्नी बच्चों और सास के साथ दिल्ली चली गई। इसके बाद वह गांव नहीं लौटी। ग्रामीणों के अनुसार बच्चों के भविष्य को देखते हुए शांति देवी ने बाद में दूसरी शादी कर ली। वर्तमान में वह कहां रह रही है इसकी जानकारी परिवार के लोगों को भी नहीं है। करीब चार साल पहले सुरेंद्र की मां कुंती देवी का भी निधन हो गया। लंबे समय तक जेल में रहने के कारण सुरेंद्र का परिवार से संपर्क भी सीमित रहा।

फांसी से बचाने के लिए नारायण सिंह रावत ने की थी कानूनी मदद
पूर्व जिला पंचायत सदस्य नारायण सिंह रावत ने सुरेंद्र की कानूनी लड़ाई में मदद की थी। रावत के अनुसार, वर्ष 2014 में सुरेंद्र को फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद डेथ वारंट भी जारी हो गया था। उन्होंने अधिवक्ता रविंद्र सिंह गढ़िया समेत अन्य लोगों से संपर्क किया और रात में अदालत खुलवाकर मामले में हस्तक्षेप कराया। रावत के मुताबिक अदालत के समक्ष तर्क रखा गया कि सुरेंद्र 14 मामलों में आरोपी है। यदि एक मामले में उसे फांसी दे दी जाती है तो बाकी मामलों की न्यायिक प्रक्रिया कैसे पूरी होगी। इसके बाद मामले में दोबारा सुनवाई के आदेश हुए।

जेल में पहली बार देखा था बेटे का चेहरा
नारायण सिंह रावत के अनुसार सुरेंद्र की मां कुंती देवी और पत्नी शांति देवी की उससे अंतिम मुलाकात डासना जेल में हुई थी। इस मुलाकात में भी उन्होंने मदद की थी। रावत ने बताया कि सुरेंद्र की इच्छा थी कि वह एक बार अपने बेटे का चेहरा देख सके। जेल जाने के समय उसका बेटा पैदा नहीं हुआ था। बाद में डासना जेल में मुलाकात के दौरान उसने पहली बार बेटे का चेहरा देखा।

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