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Nainital News: खुशबू से महकता है और खुशी से भर उठता है एसएनसीयू
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मेडिकल कॉलेज के एसएनसीयू में मौजूद स्टाफ। विज्ञप्ति
हल्द्वानी। उनको वक्त ने एक मां के आंचल से महरूम कर दिया, उनकी जिंदगी पर खतरा भी आया। पर कुदरत को कुछ और ही मंजूर था... वह लावारिस नवजात लोगों और पुलिस की मदद से मेडिकल काॅलेज के बाल विभाग के सिक नियो नेटल केयर यूनिट (एसएनसीयू) अस्पताल में पहुंचते हैं, यहां उन्हें न सिर्फ नई जिंदगी मिलती है, बल्कि एक साथ कई मां भी मिलती है। ये डॉक्टर और नर्स इलाज करती हैं साथ ही एक अभिभावक की तरह देखभाल भी करती हैं। उनके खुशी, खुशबू समेत आम बोलचाल के नाम रखे जाते हैं और अपने घर से कपड़े भी लेकर पहुंचती हैं।
मेडिकल काॅलेज के एसएनसीयू में तीन साल में करीब 15 लावारिस मिले नवजात को भर्ती कराया गया। इनमें से अधिकांश की उम्र एक से दो दिन की थी। अस्पताल के चिकित्सक बताते हैं कि जो बच्चे आए थे, उनमें कई की हालत बेहद गंभीर थी। बच्चों के आने के साथ डॉक्टर समेत अन्य स्टाफ बच्चे की जान बचाने के लिए जुटा। बच्चे ठीक होने लगे तो स्टाफ की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। सरकारी कागजों में भले बच्चों की पहचान के लिए नंबर जारी किया गया था, पर स्टाफ ने बच्चों को अनाम नहीं रहने दिया। बोलचाल में किसी को खुशी तो किसी को खुशबू नाम दिया और किसी ने बच्चे को कन्नू कहा।
बाल रोग विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. ऋतु रखोलिया कहती हैं कि जो नवजात एसएनसीयू पहुंचे, उसमें अधिकतर को बचा लिया गया। इन बच्चों के इलाज और देखभाल का खास ध्यान रखना जाता है। पूरा स्टाफ घर के बच्चे की तरह हर छोटी बड़ी बात का ध्यान रखता है। बच्चों से स्टाफ का भावनात्मक लगाव हो ही जाता है। कई बार स्टाफ इन बच्चों के लिए घर से कपड़े लेकर आते हैं। जब बच्चों को अल्मोड़ा शिशु सदन भेजने का समय आता है तो उनकी आंखें नम हो जाती हैं।
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बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. गुरप्रीत सिंह कहते हैं कि बच्चों को इंफेक्शन समेत अन्य चीजों से बचाना चुनौती होता है। इसका ध्यान रखना होता है। सभी स्टाफ खासी मेहनत करता है जब बच्चे स्वस्थ होते हैं तो खुशी भी काफी होती है। कुछ बच्चों को इलाज के लिए तीन महीने तक भी रखना पड़ा था।
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मेडिकल काॅलेज के एसएनसीयू में तीन साल में करीब 15 लावारिस मिले नवजात को भर्ती कराया गया। इनमें से अधिकांश की उम्र एक से दो दिन की थी। अस्पताल के चिकित्सक बताते हैं कि जो बच्चे आए थे, उनमें कई की हालत बेहद गंभीर थी। बच्चों के आने के साथ डॉक्टर समेत अन्य स्टाफ बच्चे की जान बचाने के लिए जुटा। बच्चे ठीक होने लगे तो स्टाफ की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। सरकारी कागजों में भले बच्चों की पहचान के लिए नंबर जारी किया गया था, पर स्टाफ ने बच्चों को अनाम नहीं रहने दिया। बोलचाल में किसी को खुशी तो किसी को खुशबू नाम दिया और किसी ने बच्चे को कन्नू कहा।
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बाल रोग विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. ऋतु रखोलिया कहती हैं कि जो नवजात एसएनसीयू पहुंचे, उसमें अधिकतर को बचा लिया गया। इन बच्चों के इलाज और देखभाल का खास ध्यान रखना जाता है। पूरा स्टाफ घर के बच्चे की तरह हर छोटी बड़ी बात का ध्यान रखता है। बच्चों से स्टाफ का भावनात्मक लगाव हो ही जाता है। कई बार स्टाफ इन बच्चों के लिए घर से कपड़े लेकर आते हैं। जब बच्चों को अल्मोड़ा शिशु सदन भेजने का समय आता है तो उनकी आंखें नम हो जाती हैं।
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बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. गुरप्रीत सिंह कहते हैं कि बच्चों को इंफेक्शन समेत अन्य चीजों से बचाना चुनौती होता है। इसका ध्यान रखना होता है। सभी स्टाफ खासी मेहनत करता है जब बच्चे स्वस्थ होते हैं तो खुशी भी काफी होती है। कुछ बच्चों को इलाज के लिए तीन महीने तक भी रखना पड़ा था।