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गोविंद बल्लभ पंत के ही प्रयासों से तराई में शुरू हुई थी बसासत
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नैनीताल। भारत रत्न पंडित गोविंद बल्लभ पंत ने न केवल स्वतंत्रता आंदोलन में अहम भूमिका निभाई बल्कि उसके बाद पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान से भारत पहुंचे लोगों को बसाने में भी अपना अहम योगदान दिया। पंडित पंत के ही प्रयासों से अविभाजित उत्तर प्रदेश का तराई क्षेत्र न केवल आबाद हुआ बल्कि तराई की भूमि ने पहले ग्रेनरी ऑफ यूपी और बाद में ग्रेनरी ऑफ इंडिया यानी उत्तर प्रदेश और देश का अनाज गोदाम के रूप में अपनी पहचान बनाई।
10 सितंबर 1887 को अल्मोड़ा के खूंट गांव में जन्मे पंडित गोविंद बल्लभ पंत स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ साथ एक कुशल अधिवक्ता और प्रशासक भी रहे। इतिहासकार प्रो. अजय रावत बताते हैं कि आजादी के बाद सबसे बड़ी समस्या बांग्लादेश समेत पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान से ट्रेनों में भरकर भारत आ रहे लोगों को बसाने की थी। तब तराई भाबर की जमीन दलदली थी, जिस कारण यह क्षेत्र बीमारियों के लिहाज से बेहद संवेदनशील था और यहां कोई बसना नहीं चाहता था। घने जंगलों में जंगली जानवरों का डर अलग बना रहता था। तब पंडित पंत यूनाईटेड प्रोविंस के मुख्यमंत्री थे। उनके ही प्रयासों से पहले पूर्वी व पश्चिमी पाकिस्तान से आने वाले शरणार्थियों को तराई भाबर में बसाया गया और उसके बाद पूर्वी उत्तर प्रदेश के।
प्रो. रावत बताते हैं कि पंत तराई भाबर की भूमि को आबाद करने के साथ-साथ इस क्षेत्र को कृषि के क्षेत्र में विशेष पहचान दिलाना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने वर्ष 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध खत्म होने के बाद बेरोजगार हो गए सैनिकों और अधिकारियों को तराई में कृषि कार्यों के लिए भूमि आवंटित कराई। पंत ने उन स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को भी तराई में बसाया जिनके पास तब कुछ भी नहीं था। इतिहासकार प्रो. रावत के मुताबिक विश्व युद्ध के बाद देश ही नहीं बल्कि दुनिया में अनाज की भारी कमी हो गई थी। इसे देखते हुए पंडित पंत ने कृषि की पढ़ाई कर कॉलेज और विश्वविद्यालयों से निकले बेरोजगार युवकों को भी तराई में कृषि कार्य के लिए भूमि आवंटित कराकर तराई की भूूमि को एडवांस एग्रीकल्चर एरिया के रूप में विकसित किया। आजादी के कुछ साल बाद ही तराई का क्षेत्र पहले ग्रेनरी ऑफ यूपी और बाद में ग्रेनरी ऑफ इंडिया के रूप में प्रसिद्ध हुआ। तब देश भर के विभिन्न प्रांतों को यहां से अनाज भेजा जाने लगा। यह पंडित पंत के ही प्रयास थे कि आज तराई भाबर खूब फल फूल रहा है।
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...जब अंग्रेज शासकों ने पंत की पुस्तक को ही प्रतिबंधित कर दिया
नैनीताल। आजादी से पूर्व अंग्रेज अधिकारी कृषि को अधिक महत्व देते थे और वनों को कम। लेकिन पंडित पंत ने इसके उलट कृषि के साथ साथ वनों को महत्व दिया। उन्हें पता था कि अगर वन सुरक्षित रहेंगे तभी खेती भी सुरक्षित रहेगी। ऐसा इसलिए क्योंकि एक हेक्टेयर भूमि में खेती के लिए कम से कम छह हेक्टेयर जंगल का होना जरूरी होता है। इतिहासकार प्रो. अजय रावत बताते हैं कि वर्ष 1878 में पहला फारेस्ट एक्ट आया जिसमें वन प्रबंधन की बात कही तो गई थी लेकिन अंग्रेज कृषि वैज्ञानिक वाल्कर ने कहा था कि खेती ज्यादा महत्वपूर्ण है वन नहीं। इसे लेकर इंग्लैंड तक की संसद में बहस हुई और उसके बाद भी खेती को ज्यादा महत्व दिया जाने लगा लेकिन आजादी के बाद पंडित पंत एग्रीकल्चर एंड फारेस्ट्री कांसेप्ट लेकर आए और उन्होंने खेती के साथ साथ वनों को भी उतना ही महत्व दिया। प्रो. रावत बताते हैं कि पंडित गोविंद बल्लभ पंत ने वर्ष 1922 में एक किताब लिखी फारेस्ट प्राब्लम इन कुमाऊं। यह किताब अंग्रेजों की वन नीति के खिलाफ थी। पंत की इस किताब से अंग्रेज खासे भयभीत हो गए। इसके बाद उन्होंने इस किताब पर प्रतिबंध लगा दिया गया। बाद में वर्ष 1980 में पंडित पंत की इस किताब को पुन: प्रकाशित किया गया।
कम्यूनिटी मैनेजमेंट के भी जनक रहे पंत
नैनीताल। पंडित गोविंद बल्लभ पंत ने वर्ष 1950-51 में इटावा में कम्यूनिटी मैनेजमेंट पर एक प्रोजेक्ट पर काम किया था। उसके बाद से ही उन्होंने अपने इस प्रोजेक्ट को तराई भाबर में भी उतारा और कई बड़ी कंपनियों को साथ लेकर तराई भाबर में पंतनगर विश्वविद्यालय, काशीपुर कुंडेश्वरी में एस्कार्ट्स और प्राग फार्म जैसे कई उद्यमों की स्थापना कराई। इससे बेरोजगारी के साथ साथ खाद्यान्न की कमी भी दूर हुई।
प्रोफाइल
नाम गोविंद बल्लभ पंत
जन्म 10 सितंबर 1887
जन्म भूमि अल्मोड़ा उत्तराखंड
मृत्यु 07 मार्च 1961
पार्टी कांग्रेस
पद प्रधानमंत्री संयुक्त प्रांत-वर्ष 1937 से 1939
- मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश- वर्ष 1946 से 1954
- गृह मंत्री भारत सरकार- वर्ष 1955 से 1961
शैक्षिक योग्यता वकालत
भाषा-हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत और कुमाऊंनी
जेल यात्रा वर्ष 1921, 1930, 1932 व 1934 के स्वतंत्रता आंदोलनों में लगभग सात साल तक जेल में रहे
पुरस्कार भारत रत्न
रचनाएं वरमाला, राजमुकुट व अंगूर की बेटी
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10 सितंबर 1887 को अल्मोड़ा के खूंट गांव में जन्मे पंडित गोविंद बल्लभ पंत स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ साथ एक कुशल अधिवक्ता और प्रशासक भी रहे। इतिहासकार प्रो. अजय रावत बताते हैं कि आजादी के बाद सबसे बड़ी समस्या बांग्लादेश समेत पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान से ट्रेनों में भरकर भारत आ रहे लोगों को बसाने की थी। तब तराई भाबर की जमीन दलदली थी, जिस कारण यह क्षेत्र बीमारियों के लिहाज से बेहद संवेदनशील था और यहां कोई बसना नहीं चाहता था। घने जंगलों में जंगली जानवरों का डर अलग बना रहता था। तब पंडित पंत यूनाईटेड प्रोविंस के मुख्यमंत्री थे। उनके ही प्रयासों से पहले पूर्वी व पश्चिमी पाकिस्तान से आने वाले शरणार्थियों को तराई भाबर में बसाया गया और उसके बाद पूर्वी उत्तर प्रदेश के।
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प्रो. रावत बताते हैं कि पंत तराई भाबर की भूमि को आबाद करने के साथ-साथ इस क्षेत्र को कृषि के क्षेत्र में विशेष पहचान दिलाना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने वर्ष 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध खत्म होने के बाद बेरोजगार हो गए सैनिकों और अधिकारियों को तराई में कृषि कार्यों के लिए भूमि आवंटित कराई। पंत ने उन स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को भी तराई में बसाया जिनके पास तब कुछ भी नहीं था। इतिहासकार प्रो. रावत के मुताबिक विश्व युद्ध के बाद देश ही नहीं बल्कि दुनिया में अनाज की भारी कमी हो गई थी। इसे देखते हुए पंडित पंत ने कृषि की पढ़ाई कर कॉलेज और विश्वविद्यालयों से निकले बेरोजगार युवकों को भी तराई में कृषि कार्य के लिए भूमि आवंटित कराकर तराई की भूूमि को एडवांस एग्रीकल्चर एरिया के रूप में विकसित किया। आजादी के कुछ साल बाद ही तराई का क्षेत्र पहले ग्रेनरी ऑफ यूपी और बाद में ग्रेनरी ऑफ इंडिया के रूप में प्रसिद्ध हुआ। तब देश भर के विभिन्न प्रांतों को यहां से अनाज भेजा जाने लगा। यह पंडित पंत के ही प्रयास थे कि आज तराई भाबर खूब फल फूल रहा है।
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...जब अंग्रेज शासकों ने पंत की पुस्तक को ही प्रतिबंधित कर दिया
नैनीताल। आजादी से पूर्व अंग्रेज अधिकारी कृषि को अधिक महत्व देते थे और वनों को कम। लेकिन पंडित पंत ने इसके उलट कृषि के साथ साथ वनों को महत्व दिया। उन्हें पता था कि अगर वन सुरक्षित रहेंगे तभी खेती भी सुरक्षित रहेगी। ऐसा इसलिए क्योंकि एक हेक्टेयर भूमि में खेती के लिए कम से कम छह हेक्टेयर जंगल का होना जरूरी होता है। इतिहासकार प्रो. अजय रावत बताते हैं कि वर्ष 1878 में पहला फारेस्ट एक्ट आया जिसमें वन प्रबंधन की बात कही तो गई थी लेकिन अंग्रेज कृषि वैज्ञानिक वाल्कर ने कहा था कि खेती ज्यादा महत्वपूर्ण है वन नहीं। इसे लेकर इंग्लैंड तक की संसद में बहस हुई और उसके बाद भी खेती को ज्यादा महत्व दिया जाने लगा लेकिन आजादी के बाद पंडित पंत एग्रीकल्चर एंड फारेस्ट्री कांसेप्ट लेकर आए और उन्होंने खेती के साथ साथ वनों को भी उतना ही महत्व दिया। प्रो. रावत बताते हैं कि पंडित गोविंद बल्लभ पंत ने वर्ष 1922 में एक किताब लिखी फारेस्ट प्राब्लम इन कुमाऊं। यह किताब अंग्रेजों की वन नीति के खिलाफ थी। पंत की इस किताब से अंग्रेज खासे भयभीत हो गए। इसके बाद उन्होंने इस किताब पर प्रतिबंध लगा दिया गया। बाद में वर्ष 1980 में पंडित पंत की इस किताब को पुन: प्रकाशित किया गया।
कम्यूनिटी मैनेजमेंट के भी जनक रहे पंत
नैनीताल। पंडित गोविंद बल्लभ पंत ने वर्ष 1950-51 में इटावा में कम्यूनिटी मैनेजमेंट पर एक प्रोजेक्ट पर काम किया था। उसके बाद से ही उन्होंने अपने इस प्रोजेक्ट को तराई भाबर में भी उतारा और कई बड़ी कंपनियों को साथ लेकर तराई भाबर में पंतनगर विश्वविद्यालय, काशीपुर कुंडेश्वरी में एस्कार्ट्स और प्राग फार्म जैसे कई उद्यमों की स्थापना कराई। इससे बेरोजगारी के साथ साथ खाद्यान्न की कमी भी दूर हुई।
प्रोफाइल
नाम गोविंद बल्लभ पंत
जन्म 10 सितंबर 1887
जन्म भूमि अल्मोड़ा उत्तराखंड
मृत्यु 07 मार्च 1961
पार्टी कांग्रेस
पद प्रधानमंत्री संयुक्त प्रांत-वर्ष 1937 से 1939
- मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश- वर्ष 1946 से 1954
- गृह मंत्री भारत सरकार- वर्ष 1955 से 1961
शैक्षिक योग्यता वकालत
भाषा-हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत और कुमाऊंनी
जेल यात्रा वर्ष 1921, 1930, 1932 व 1934 के स्वतंत्रता आंदोलनों में लगभग सात साल तक जेल में रहे
पुरस्कार भारत रत्न
रचनाएं वरमाला, राजमुकुट व अंगूर की बेटी