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संजीव ने राज्य और केंद्र के पाले में खिसकाई गेंद
अमर उजाला ब्यूरो हल्द्वानी।
Updated Wed, 12 Jul 2017 02:08 AM IST
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संजीव चतुर्वेदी
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भारतीय वन सेवा के अधिकारी संजीव चतुर्वेदी ने उत्तराखंड हाइकोर्ट से मायूस होने के बाद अब अपने मुद्दे को राज्य और केंद्र सरकारों के पाले में खिसका दिया है। कुछ दिन पहले ही संजीव चतुर्वेदी के एक मामले में हाइकोर्ट ने सीधी सु़नवाई से इनकार करते हुए संजीव को पहले केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट) में जाने को कहा था।
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अब संजीव ने केंद्र और उत्तराखंड के विधि विभाग को पत्र लिखकर सुझाव दिया है कि हाइकोर्ट के इस फैसले के बाद सरकार पूर्व में हाइकोर्ट में सेवा संबंधित सीधे गए सभी मामलों पर पुनर्विचार याचिका दाखिल करे।
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याद रहे, 19 जून को मुख्य न्यायाधीश केएम जोसफ की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने उनकी सेवा संबंधी याचिका की सीधी सुनवाई से इंकार कर दिया था। हाइकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के 18 मार्च 1997 को एल चंद्रकुमार के वाद में दिए फैसले का हवाला देते हुए उन्हें पहले कैट जाने को कहा है।
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कैट अगर उनकी किसी मांग के निपटारे में असमर्थता जताए तो वापस हाइकोर्ट आने को कहा है। हाइकोर्ट के इसी फैसले को संजीव ने आधार बनाते हुए उत्तराखंड के मुख्य सचिव एस रामास्वामी, केंद्र और राज्य सरकार के विधि विभागों को पत्र भेजा है।
संजीव ने पत्र में लिखा है कि हाइकोर्ट के इस फैसले के बाद पिछले 20 वर्षों में हाइकोर्ट ने सेवा संबंधी जिन मामलों में सीधी सुनवाई करते हुए राज्य सरकार के विरुद्घ फैसले दिए हैं, वे खुद ही अवैधानिक हो गए हैं। कहा है, यह भी तय हो गया है कि सूबे में कार्यरत केंद्र और राज्य सरकार का कर्मी सेवा संबंधी मामलों में सीधे हाइकोर्ट नहीं जा सकता है।
संजीव ने केंद्र और राज्य विधि विभाग से जल्द से जल्द पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल करने का आग्रह किया है। उनका कहना है कि इससे न केवल गलत ढंग से किये करोड़ों के भुगतान की वसूली होगी बल्कि सराकरी वकीलों को दिए जाने वाली भारी फीस की मद में भी बचत होगी।
वहीं वादों में राज्य सरकार के लगने वाले समय, संसाधन की भी बचत होगी। संजीव ने अपने पत्र में सेवा संबंधी दो मामलों का जिक्र करते हुए हाइ कोर्ट द्वारा रिट ज्यूरिस्डिक्शन के अधिकार के उपयोग पर भी टिप्पणी की है।
पहला मामला
ताजा मामला 23 जून का है जिसमें हाइ कोर्ट की मुख्य न्यायाधीश केएम जोसफ की खंड पीठ ने पेयजल संसाधन विकास निर्माण निगम के कर्मी नरेंद्र मेहता की याचिका पर सुनवाई करते हुए आदेश पारित कि ये और उसे प्रशासनिक न्यायाधिकरण नहीं भेजा गया है। वहीं चार दिन पूर्व संजीव को कैट जाने के निर्देश दिए गए थे।
दूसरा मामला
चंपावत के वर्तमान प्रभागीय वनाधिकारी अशोक गुप्ता ने नवंबर 2016 और जनवरी 2017 में में हाइ कोर्ट में याचिका दाखिल कर अपनी ही पदोन्नति व स्थानांतरण को चुनौती दी थी इसे सुनवाई के लिए स्वीकारते हुए मुख्य न्यायाधीश केएम जोसफ ने इस मामले में आदेश पारित किया था।
इस मामले में अशोक गुप्ता की पैरवी अधिवक्ता राकेश थपलियाल ने की थी जो केंद्र सरकार के सहायक अपर महाधिवक्ता भी है। संजीव ने अपने पत्र में लिखा है कि इस मामले में राज्य सरकार के वकील ने एल चंद्रकुमार वाले मामले को लेकर आपत्ति क्यों नहीं उठाई थी।