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नदी को 70 फीट तक खोदने के बाद भी नहीं टला बाढ़ का खतरा

Mon, 19 Dec 2016 01:28 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, नैनीताल।
ब्यूरो/अमर उजाला, नैनीताल। Updated Mon, 19 Dec 2016 01:28 AM IST
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River floods also averted the danger of not following the sinking of up to 70 feet
खनन - फोटो : अमर उजाला

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 गौला में खनन इसलिए भी होता है कि बाढ़ का पानी जंगल और आबादी को नुकसान न पहुंचाए। इसी तस्वीर का दूसरा पक्ष यह भी है कि नदी को कई जगहों पर करीब 70 फीट गहरा खोद दिया गया है। इसके बाद भी बाढ़ के पानी से नुकसान खतरा टला नहीं है। वहीं, रिवर ट्रेनिंग नीति का मामला नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) तक भी पहुंच सकता है। 
पिछले सालों में बारिश लगातार कम हुई है। इसके कारण खनिज (पत्थर, रेत, बजरी) की मात्रा कम हुई है। पिछले साल खनिज कम होने के कारण खनन व्यवसायियों ने प्रतिबंधित इलाके में भी खुदाई कर दी थी। इससे नदी में पत्थर की जगह मिट्टी तक निकल आई थी। गोरा पड़ाव, बेरी पड़ाव, शीशमहल आदि इलाके में गौला की गहराई करीब 60 से 70 फीट तक पहुंच गई है। इसके बावजूद खनिज निकासी का काम जारी है। यही स्थिति इस बार भी है। खनिज की मात्रा इस बार भी बेहद कम है। बाढ़ से बचाव आदि के लिए खनिज की निकासी शुरू हो गई है।
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अब रिवर ट्रेनिंग नीति का मामला एनजीटी जा सकता है। पूर्व में गौला में अवैध खनन के मामले को लेकर एनजीटी में केस करने वाले दिनेश पांडे के मुताबिक रिवर ट्रेनिंग का मामला उनके संज्ञान में है। पांडे के मुताबिक बाढ़ से बचाव के लिए खनन की बात कही गई, लेकिन उसके सुरक्षा ढांचे को कोई जिक्र नहीं है। ऐसे में नीति पर भी सवाल है। मामले को लेकर एनजीटी में केस करने पर विचार किया जा रहा है।
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सभी पहलू पर विचार किया जा सकता : वन मंत्री
हल्द्वानी। रिवर ट्रेनिंग नीति के बारे में वन मंत्री दिनेश अग्रवाल का कहना है कि नीति जनहित में बनाई जाती है। अगर कोई कमी है, तो उसको दुरुस्त भी किया जा सकता है। नीति में कोई सुधार, संशोधन की गुंजाइश समेत सभी पहलुओं पर विचार किया जा सकता है। अग्रवाल के मुताबिक प्रदेश में नदियों में खनन नहीं किया जाता, बल्कि यहां चुगान किया जा रहा है। नदियों से अगर आरबीएम नहीं उठाया जाएगा तो तटीय इलाकों को नुकसान होगा। इसके अतिरिक्त प्रदेश में निर्माण कार्य के लिए भी रेत, बजरी आदि की जरूरत है। 
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