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दुनिया में ज्ञान ही चिर स्थाई : प्रो. वल्दिया
ब्यूरो/अमर उजाला, नैनीताल
Updated Mon, 13 Apr 2015 02:17 AM IST
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प्रसिद्ध भूगर्भविद्, पद्मभूषण प्रो. खड्ग सिंह वल्दिया ने कहा कि दुनिया में जो चिर स्थाई है, वह है ज्ञान। अपने दादा की इस सीख, गुरुजनों के पथ प्रदर्शन तथा नेताजी सुभाष चंद्र बोस के 1944 में सुने भाषणों ने उन्हें देश के लिए कुछ कर गुजरने को प्रेरित किया। उन्होंने गरीबी, कान से कम सुनने की अक्षमता के बावजूद लक्ष्य तय किया और उस लक्ष्य को पाने के सफर में आज यहां तक आ पहुंचे हैं। रविवार का यह मौका था राज्य अतिथि गृह में प्रो. वल्दिया की आत्मकथा ‘पथरीली पगडंडियों पर’ पुस्तक का।
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प्रो. वल्दिया ने अपने संस्मरण सुनाते हुए कहा कि 1940 के दशक में जापानी हमले में अपना सबकुछ गंवा चुके उनके दादा जी लक्ष्मण परिवार को लेकर बर्मा से पिथौरागढ़ आ गए थे। उनके दादा का कहना था कि जो चिर स्थाई रहता है वह है ज्ञान, इसलिए वह अपने पोतों को ज्ञान दिलाएंगे। इसके बाद उन्होेंने गुरु ईश्वरी दत्त पंत, माधवानंद उप्रेती, ईश्वर बहुगुणा के बताए ज्ञान से अभिभूत होकर शिक्षा अर्जित की। प्रो. वल्दिया ने फरवरी 1944 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के भाषणों के अनुरूप धर्म, जाति के विभाजन के इतर आजीवन हिंदुस्तानी बने रहने का संकल्प लिया और उसका पालन कर रहे हैं।
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अध्यक्षता कर रहे पद्मभूषण और गांधी शांति पुरस्कार से नवाजे गए चंडी प्रसाद भट्ट ने प्रो. वल्दिया को अर्जुन और एकलव्य की संज्ञा देते हुए कहा कि उनकी आत्मकथा पाठकों को प्रेरणा देगी। प्रयाग जोशी ने कहा कि प्रो. वल्दिया की आत्मकथा में उनके सफल वैज्ञानिक होने के साथ बेहतर लेखक होने की पुष्टि होती है। बीडी खर्कवाल, देवेंद्र मेवाड़ी ने कहा कि प्रो. वल्दिया बचपन से ही वैज्ञानिक तथ्य के पक्षधर रहे हैं, उन्होंने साधु की द्वारा उनकी उम्र 33 वर्ष बताने की बात को नहीं नहीं माना और आज वह 80 बसंत देख चुके हैं। कार्यक्रम को डा. कविता पांडे, डा. एलएस बिष्ट बटरोही ने भी संबोधित किया। इस दौरान मुख्य आयोजक पहाड़ पत्रिका के प्रो. शेखर पाठक, प्रो. एचएस धामी, राजीव लोचन साह, जेएस मेहता, इंदिरा वाल्दिया, प्रो. जीएस नेगी, डा. पुष्किन फर्त्याल, प्रयाग पांडे, पीजी सिथर, डा.एनएस जंतवाल आदि थे। संचालन डा. गिरजा पांडे ने किया।
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...और भूगर्भ के ‘डाक्टर’ बन गए वल्दिया साहब
प्रो. खड़ग सिंह वल्दिया की ख्वाहिश डाक्टर बनने की थी, लेकिन कानों से कम सुनने की वजह इसमें बाधक बन गई। इससे वह निराश नहीं हुए ठानी थी डाक्टर बनने की तो भूगर्भ के ही डाक्टर बन गए। प्रसिद्ध भूगर्भविद् ने अपनी आत्मकथा ‘पथरीली पगडंडियों पर’ में इस बात का जिक्र भी किया है। उनकी आत्मकथा का प्रकाशन पहाड़ पत्रिका ने किया है। पहाड़ के संपादक पद्मश्री प्रो. शेखर पाठक कहते हैं कि उनकी आत्मकथा ‘पथरीली पगडंडियों पर’ उनके संघर्षों और अंग्रेजों, जापानी औपनिवेश, भारत का सामाजिक तानाबाना है। प्रो. पाठक के मुताबिक प्रो. वल्दिया को डाक्टर नहीं बन पाने का मलाल आज भी है।
नदियों का अप्राकृतिक दोहन है आपदाओं की वजह: भट्ट
पद्मभूषण खड़ग सिंह वल्दिया की आत्मकथा के विमोचन अवसर पर यहां पहुंचे प्रसिद्ध पर्यावरणविद् मैग्सैसे और पद्मभूषण पुरस्कार से सम्मानित चंडी प्रसाद भट्ट का कहना है कि नदियों के अप्राकृतिक दोहन के कारण हिमालयी क्षेत्रों में आपदाएं आ रही हैं। केदारनाथ और धारचूला में आई आपदाएं इसका ज्वलंत उदाहरण हैं। नदियों को व्यापक रूप से नुकसान पहुंचाए जाने के कारण ही उनका वीभत्स रूप आपदा के रूप में देखने को मिला है। पर्यावरणविद् श्री भट्ट ने दो टूक कहा कि मंदाकिनी, गोरी, काली, घाघरा, अलकनंदा, भागीरथी आदि नदियों में बिजली परियोजना बनाने से पहले इनके संरक्षण के बारे में सोचना होगा। नदियां हमारे आजीविका और अस्तित्व से जुड़ी हैं। विद्युत परियोजनाएं बनाने से पहले अध्ययन किया जाना चाहिए। वन अधिनियम 1980 के संबंध में उन्होंने कहा कि ग्रामीणों को हक हकूक से वंचित नहीं किया जा सकता। इसका अनुपालन कराने वालों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए कि वन अधिनियम में कौन सी बाधाएं आ रही हैं।