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पुलिस इंस्पेक्टरों के परीक्षा परिणाम पर रोक
अमर उजाला ब्यूरो,नैनीताल।
Updated Thu, 04 Aug 2016 01:00 AM IST
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नैनीताल। पिछले लंबे समय से विवाद का कारण बने पुलिस इंस्पेक्टरों की पदोन्नति के मामले में बुधवार को हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की एकल पीठ ने इंटरव्यू की प्रक्रिया को जारी रखते हुये परीक्षा परिणाम घोषित करने पर रोक लगा दी है।
देहरादून निवासी सुभाष चंद्र और अन्य ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि याचिकाकर्ताओं का सब इंस्पेक्टर पद पर 1999 में चयन हुआ था। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उनके चयन पर रोक लगा दी थी। इसके बाद उन्हेें 2007 में ट्रेनिंग के लिए भेजा गया। उत्तर प्रदेश में जो अभ्यर्थी उस चयन प्रक्रिया में चयनित हुए थे उनकी नियुक्ति उत्तर प्रदेश सरकार ने 10 सितंबर 2001 से मानी तथा तभी से उन्हें वरिष्ठता दी थी।
जो 66 अभ्यर्थी उत्तराखंड स्थानांतरित हुए उन्हें उत्तराखंड सरकार ने वरिष्ठता के लाभ से वंचित रखा। याचिका में कहा कि इस संबंध में पूर्व में इन अभ्यर्थियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। जिसे एकल पीठ ने खारिज कर दिया था। एकल पीठ के इस आदेश के खिलाफ याचिकाकर्ताओं ने खंडपीठ के समक्ष स्पेशल अपील के माध्यम से चुनौती दी थी। खंडपीठ ने डीजीपी को आदेश दिया था कि वह उनकी वरिष्ठता पर विचार करें।
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डीजीपी ने आदेश के अनुपालन में 21 मार्च 2016 को आदेश पारित कर याचिकाकर्ताओं को 10 सितंबर 2001 से वरिष्ठता देने के आदेश दिए। राज्य सरकार ने 16 जुलाई 2016 को डीजीपी के आदेश को निरस्त कर दिया। याचिकाकर्ताओं की ओर से राज्य सरकार के इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
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देहरादून निवासी सुभाष चंद्र और अन्य ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि याचिकाकर्ताओं का सब इंस्पेक्टर पद पर 1999 में चयन हुआ था। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उनके चयन पर रोक लगा दी थी। इसके बाद उन्हेें 2007 में ट्रेनिंग के लिए भेजा गया। उत्तर प्रदेश में जो अभ्यर्थी उस चयन प्रक्रिया में चयनित हुए थे उनकी नियुक्ति उत्तर प्रदेश सरकार ने 10 सितंबर 2001 से मानी तथा तभी से उन्हें वरिष्ठता दी थी।
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जो 66 अभ्यर्थी उत्तराखंड स्थानांतरित हुए उन्हें उत्तराखंड सरकार ने वरिष्ठता के लाभ से वंचित रखा। याचिका में कहा कि इस संबंध में पूर्व में इन अभ्यर्थियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। जिसे एकल पीठ ने खारिज कर दिया था। एकल पीठ के इस आदेश के खिलाफ याचिकाकर्ताओं ने खंडपीठ के समक्ष स्पेशल अपील के माध्यम से चुनौती दी थी। खंडपीठ ने डीजीपी को आदेश दिया था कि वह उनकी वरिष्ठता पर विचार करें।
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डीजीपी ने आदेश के अनुपालन में 21 मार्च 2016 को आदेश पारित कर याचिकाकर्ताओं को 10 सितंबर 2001 से वरिष्ठता देने के आदेश दिए। राज्य सरकार ने 16 जुलाई 2016 को डीजीपी के आदेश को निरस्त कर दिया। याचिकाकर्ताओं की ओर से राज्य सरकार के इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।