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प्लास्टिक कचरे का निपटारा कागजों में हो रहा, धरातल पर नहींः हाईकोर्ट

Haldwani Bureau हल्द्वानी ब्यूरो
Updated Mon, 12 Sep 2022 10:30 PM IST
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Plastic waste is being disposed of on paper, not on the ground: High Court
नैनीताल। प्लास्टिक कचरे पर रोक लगाने और इसके निस्तारण में ढिलाई पर हाईकोर्ट ने नाखुशी व्यक्त की है। जिलाधिकारियों की ओर से पेश शपथपत्र पर नाराजगी जताते हुए अदालत ने कहा है कि सरकार की ओर से प्लास्टिक कचरे के निपटारे के लिए कोई कानूनी कदम नहीं उठाया जा रहा है। धरातल पर काम नहीं हो रहा है, केवल कागजी काम किए जा रहे हैं। अदालत ने सरकार से इस संबंध में मॉडल एसओपी बनाने के लिए कहा है।
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मुख्य न्यायाधीश विपिन सांघी एवं न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ के समक्ष अल्मोड़ा के हवालबाग निवासी जितेंद्र यादव की जनहित याचिका पर सुनवाई हुई। कोर्ट ने राज्य सरकार की ओर से 2019 में बनाई गई प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट कमेटी को पक्षकार बनाते हुए कहा कि आज के बाद नियमों के अनुपालन के लिए कमेटी जिम्मेदार होगी। कमेटी सभी जिलाधिकारियों के साथ बैठक करे और कचरे की समस्या का समाधान तलाशे। कोर्ट ने सभी डीएफओ को अपने क्षेत्रों में आने वाली वन पंचायतों का मैप बनाकर डिजिटल प्लेटफार्म पर अपलोड करने और शिकायत एप बनाने के लिए कहा ताकि इसमें दर्ज शिकायतों का निपटारा किया जा सके। कोर्ट ने कहा वन क्षेत्रों में फैले कचरे पर वन विभाग कार्रवाई करे। कोर्ट ने क्षेत्र के दौरे के समय सामने आईं कमियों को दूर करने के लिए भी कहा। जिलाधिकारियों को भारत सरकार के प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स का अनुपालन करवाने के निर्देश दिए।
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पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड की ओर से अदालत को बताया गया कि कई निकायों ने पीसीबी के नियमों का पालन नहीं किया है। ऐसे निकायों पर पीसीबी पर्यावरणीय क्षति के लिए एक लाख रुपया प्रति माह के हिसाब से जुर्माना लगा सकता है। कोर्ट ने कहा है कि जिन निकायों ने अभी तक प्रगति रिपोर्ट पेश नहीं की है वे 19 अक्तूबर तक रिपोर्ट पेश करें। इसी दिन मामले की अगली सुनवाई होगी।
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ये थी याचिका
जितेंद्र यादव ने जनहित याचिका में कहा था कि राज्य सरकार ने 2013 में प्लास्टिक के प्रयोग और उसके निपटारे के लिए नियमावली बनाई थी। उसका पालन नहीं किया जा रहा है। केंद्र सरकार ने भी प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स बनाए गए थे। इसमें उत्पादनकर्ता, परिवहनकर्ता और विक्रेताओं को जिम्मेदारी दी थी कि वे जितना प्लास्टिक निर्मित माल बेचेंगे उतना ही खाली प्लास्टिक को वापस ले जाएंगे। अगर नही ले जाते है तो संबंधित नगर निगम, नगर पालिका व अन्य को फंड देंगे ताकि वे कचरे का निस्तारण कर सकें। उत्तराखंड में इसका उल्लंघन किया जा रहा है।
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