फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttarakhand ›   Nainital News ›   Just need to make a common feature

बसानी को बस आम सुविधाओं की दरकार

Wed, 04 Feb 2015 02:09 AM IST
निशांत खनी/अमर उजाला,हल्द्वानी
निशांत खनी/अमर उजाला,हल्द्वानी Updated Wed, 04 Feb 2015 02:09 AM IST
विज्ञापन
Just need to make a common feature

विकासखंड हल्द्वानी के अंतिम छोर में बसे बसानी के लोग आजादी के 67 सालों बाद भी बुनियादी सुविधाओं के लिए जूझ रहे हैं। चारों तरफ हरेभरे जंगलों के बीच बसे खूबसूरत गांव की पेयजल और सिंचाई की व्यवस्था आज भी जल स्रोतों पर निर्भर है। जल स्रोत सूखने पर पानी की कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं है।

विज्ञापन


करीब 550 आबादी वाले इस गांव में हाईस्कूल तक नहीं है। हाईस्कूल के लिए दो किमी दूर और इंटर की पढ़ाई करने के लिए बच्चों को 10 किमी दूर हल्द्वानी लामाचौड़ कठघरिया आना पड़ता है। गांव के लोगों ने कलेक्टर तो दूर अब तक तहसीलदार की शक्ल ही नहीं देखी है। नेताओं के चेले-चपाटे भी चुनाव से पहले सिर्फ वोट मांगने आते हैं।
विज्ञापन



बसानी ग्राम पंचायत में करीब 189 परिवार हैं। फतेहपुर से बसानी तक पहुंचने के लिए घने जंगलों से होकर गुजरना पड़ता है। गांव में 2013 में होम्योपैथिक अस्पताल खुला है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र नहीं होने से ग्रामीणों को हल्द्वानी आना पड़ता है। 8वीं की पढ़ाई के बाद बच्चों को हाईस्कूल के लिए दो किमी दूर नाइसिला और इंटर की पढ़ाई के लिए कठघरिया आना पड़ता है। इससे लड़कियां हाईस्कूल के बाद आगे की पढ़ाई नहीं कर पाती हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन


कोट
>> गांव में बुनियादी सुविधाओं के लिए ग्रामीण दशकों से संषर्घ कर रहे हैं। खुद की जमीन दान करने के बाद अब जाकर होम्योपैथिक अस्पताल बना है। पेयजल और सिंचाई के लिए ट्यूबवेल का प्रस्ताव सालों से लटका है। प्रशासनिक अफसर तो दूर गांव में नेता सिर्फ चुनाव के वक्त दिखते हैं। ब्लाक का आखिरी गांव होने से बसानी उपेक्षित है। -विमला तड़ागी, ग्राम प्रधान

गांव के लिए पीने का पानी गाजा और सिंचाई के लिए मौना स्रोत से आता है। गर्मियां शुरू होते ही पानी सूखने लगता है। अप्रैल से मई तक पानी के लिए हाहाकार रहता है। गांव में ट्यूबवेल लगाने का प्रस्ताव कई बार दे चुके हैं, लेकिन सुनवाई नहीं होती है। - केआर आर्या, उप प्रधान


अधिकतर ग्रामीणों की आजीविका पशुपालन और कृषि पर निर्भर है। कुछ ग्रामीण मजदूरी करते हैं। इलाके में सुअर और नील गाय का आतंक है। जंगली जानवर टमाटर, गेहूं, मडुवा, मक्का, भिंडी और आलू की फसल को चौपट कर देते हैं। वन विभाग से ग्रामीणों को मुआवजा नहीं मिलता है। - हेमंत तड़ागी, ग्रामीण



जैसे-तैसे गांव के मुहाने तक पक्की सड़क पहुंची है। इसके बाद करीब सात सौ मीटर की कच्ची सड़क है, जो बरसात में बह जाती है। ग्रामीण श्रमदान कर हर साल सड़क बनाते हैं। यह सिलसिला दशकों से चला आ रहा है। - शांति तड़ागी, वार्ड सदस्य

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed