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भारत हित में है तिब्बत की आजादी
ब्यूरो/अमर उजाला, नैनीताल
Updated Tue, 28 Apr 2015 01:57 AM IST
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नैनीताल। 2001 के पहले आउटलुक पिकाडोर नॉन फिक्शन अवार्ड विजेता तेनजिन त्सुन्दू ने कहा कि तिब्बत की आजादी भारत के हित में है। वह आज भी अपने और तिब्बतियों के वजूद को लेकर चिंतित हैं। तिब्बतियों के संघर्ष, आजादी की उम्मीद और उनके वजूद के दर्द को उन्होंने अपनी कविताओं में बयां किया है।
पवेलियन होटल में पत्रकारों से बातचीत में तिब्बती कवि ने अपने गुलामी के दर्द को बयां किया। उन्होंने कहा कि 22 वर्ष की उम्र में 1997 में उन्होंने तिब्बत जाने का निर्णय लिया। जोखिम उठाते हुए पैदल हिमालयी दर्रे को पार करते हुए वह सीमा पर पहुंचे, लेकिन चीन पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर ल्हासा जेल में डाल दिया। जासूसी की आशंका के डर से उन्हें खूब प्रताड़ित किया गया। बाद में उनके एक कवि होने की पुष्टि पर तीन माह बाद उन्हें लद्दाख सीमा पर छोड़ दिया गया।
त्सुन्दू ने बताया कि उसके बाद उन्हें लगा कि भारत में जन्म लेने के बाद न तो वह पूरी तरह भारतीय हैं और न तिब्बती हैं। इसके बाद उनके मस्तिष्क में अपने और समुदाय के वजूद को लेक र सवाल उठा। आज भी वह उसे तलाश रहे हैं। यही दर्द उनकी कविताओं में भी है। फिल्म एवं आर्ट्स गिल्ड आफ उत्तराखंड से जुड़े साहित्यकार अशोक पांडे ने कहा कि अब तक वह कई देशी विदेशी भाषाओं की कविताओं का अनुवाद कर चुके हैं। त्सुन्दू की कविताओं के अनुवाद का भी उन्हें सौभाग्य मिला। उनकी कविताओं में वतन और वजूद दोनों कादर्द छिपा है। इस मौके पर पीजी सिथर, रूडी सिंह, मंजूर हुसैन आदि शामिल थे। इसके बाद यहां कविता पाठ किया गया व फिल्म भी दिखाई गई।
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पवेलियन होटल में पत्रकारों से बातचीत में तिब्बती कवि ने अपने गुलामी के दर्द को बयां किया। उन्होंने कहा कि 22 वर्ष की उम्र में 1997 में उन्होंने तिब्बत जाने का निर्णय लिया। जोखिम उठाते हुए पैदल हिमालयी दर्रे को पार करते हुए वह सीमा पर पहुंचे, लेकिन चीन पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर ल्हासा जेल में डाल दिया। जासूसी की आशंका के डर से उन्हें खूब प्रताड़ित किया गया। बाद में उनके एक कवि होने की पुष्टि पर तीन माह बाद उन्हें लद्दाख सीमा पर छोड़ दिया गया।
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त्सुन्दू ने बताया कि उसके बाद उन्हें लगा कि भारत में जन्म लेने के बाद न तो वह पूरी तरह भारतीय हैं और न तिब्बती हैं। इसके बाद उनके मस्तिष्क में अपने और समुदाय के वजूद को लेक र सवाल उठा। आज भी वह उसे तलाश रहे हैं। यही दर्द उनकी कविताओं में भी है। फिल्म एवं आर्ट्स गिल्ड आफ उत्तराखंड से जुड़े साहित्यकार अशोक पांडे ने कहा कि अब तक वह कई देशी विदेशी भाषाओं की कविताओं का अनुवाद कर चुके हैं। त्सुन्दू की कविताओं के अनुवाद का भी उन्हें सौभाग्य मिला। उनकी कविताओं में वतन और वजूद दोनों कादर्द छिपा है। इस मौके पर पीजी सिथर, रूडी सिंह, मंजूर हुसैन आदि शामिल थे। इसके बाद यहां कविता पाठ किया गया व फिल्म भी दिखाई गई।
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