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हिंदी : घर में दुर्दशा की मारी, परदेस से तजुर्बे की तैयारी
प्रवेश कुमारी/अमर उजाला,हल्द्वानी
Updated Wed, 06 May 2015 01:56 AM IST
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हिंदी अपने घर में भले दुर्दशा का दंश झेल रही है, लेकिन उत्तराखंड की हिंदी अकादमी का पूरा ध्यान बजाय यहां दशा सुधारने के, विदेशों में हिंदी की पढ़ाई की किस तरह हो रही है, उसके अध्ययन पर ज्यादा है। इसके लिए डा. पीतांबर दत्त बड़थ्वाल हिंदी अकादमी ने महत्वाकांक्षी योजना तैयार की है। अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा के साथ बातचीत भी हो चुकी है। केंद्रीय हिंदी निदेशालय से भी मार्गदर्शिका मांगी गई है।
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मोटे तौर पर अकादमी का उद्देश्य दुनिया भर के हिंदी विशेषज्ञों को एक मंच पर लाना है ताकि वह आपस में हिंदी की पढ़ाई से जुड़े विभिन्न पहलुओं, जानकारी को साझा कर सकें। इसकेलिए एक्सचेंज प्रोग्राम चलाए जाने की भी तैयारी है ताकि एक देश के विशेषज्ञ दूसरे देश में जाकर हिंदी की पढ़ाई के तौर-तरीकों की जानकारी हासिल कर सकें।
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यह योजना इसलिए तैयार की गई है ताकि दुनिया भर में हिंदी को लेकर बात हो। ढौंडियाल की मानें तो इस योजना को इसी वित्तीय वर्ष यानी मार्च 2016 तक परवान चढ़ाने की तैयारी है। फिलहाल पूरी कवायद पर आने वाले खर्च का ब्योरा तैयार किया जा रहा है। इसके लिए पैसा नान प्लान बजट से लिया जाएगा।
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-वीके ढौंडियाल, सचिव , डा. पीतांबर दत्त बड़थ्वाल हिंदी अकादमी, देहरादून
हिंदी भाषी क्षेत्र में ही बुरा हाल
उत्तराखंड हिंदी भाषी यानी ‘क’ क्षेत्र में पड़ता है। यहां सरकारी विभागों में 100 प्रतिशत हिंदी में कामकाज का लक्ष्य रखा गया है। लेकिन आज तक कभी यह लक्ष्य हासिल नहीं हो पाया है। आलम यह है कि 120 सरकारी विभागाें में हिंदी कामकाज की प्रगति के संबंध में हर छह माह में नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति की बैठक होती है, लेकिन इसमें उपस्थिति का आंकड़ा भी कभी सौ फीसदी नहीं रहा। विभागों में भी राजभाषा कार्यान्वयन समिति का गठन किया गया है। इसकी बैठक हर तीन माह में होती है, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा है।
घर में स्तर सुधारें तब बाहर पधारें
भारतीय पेट्रोलियम संस्थान (आईआईपी) में वरिष्ठ हिंदी अधिकारी ओर बाल साहित्यकार डा. दिनेश चमोला भी मानते हैं कि हिंदी की पढ़ाई का स्तर पहले घर में सुधारा जाना चाहिए, इसके बाद बाहर की तैयारी होनी चाहिए। आखिर हिंदी विदेशों की राजभाषा तो है नहीं।