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अल्पसंख्यक वोटों को हथियाने की राजनीति में उलझे
राजीव शुक्ला
Updated Wed, 31 Aug 2016 12:01 AM IST
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विधानसभा हल्द्वानी में चुनाव के लिए सियासी समीकरण बनने-बिगड़ने लगे हैं। कांग्रेस, भाजपा और सपा अल्पसंख्यक वोट बैंकों में पैठ बनाने में जुट गई है।
कांग्रेस ने सपा के प्रदेश महासचिव अब्दुल मतीन सिद्दकी को अपने पाले में मिलाकर अल्पसंख्यक वोट बैंकों की राजनीति को और तीखा कर दिया है।
एक से अधिक दावेदार होने के कारण भाजपा का गणित उलझा हुआ है। जोर का झटका धीरे से लगने के कारण समाजवादी पार्टी अब मतीन का विकल्प तलाशने में जुटी है।
हल्द्वानी विधानसभा में किसी भी प्रत्याशी का गणित बनाने में लगभग 50 हजार अल्पसंख्यक मतदाता अहम भूमिका निभाते हैं। 2012 के चुनाव में अल्पसंख्यक मत सपा प्रत्याशी अब्दुल मतीन सिद्दीकी और कांग्रेस प्रत्याशी डा. इंदिरा हृदयेश को सबसे अधिक पड़े थे।
डा. हृदयेश के विजयी होने के साथ ही भाजपा दूसरे और सपा तीसरे नंबर पर थी। डा. हृदयेश ने सबसे अधिक दमुवाढूंगा और मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र बनभूलपुरा, इंदिरा नगर आदि से लीड बनाई थी। 2012 में 61,348 पुरुष और 53,391 महिलाओं ने मताधिकार का प्रयोग किया था।
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अब साढ़े चार वर्षों में काफी कुछ बदला है। डा. हृदयेश ने दमुवाढूंगा को नगर निगम में शामिल करा कर यहां के 20 हजार मतदाताओं का विश्वास हासिल करने की कोशिश की थी।
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इस कदम से इंदिरा ने अपने ऊपर दबाव को काफी हद तक कम कर लिया। मतीन के बहाने अल्पसंख्यक वोट बैंक में पैठ बनाने की कांग्रेस की कोशिश से इंदिरा की राह अब और आसान मानी जा रही है।
कांग्रेस से इतर भाजपा ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं। भाजपा में पूर्व प्रत्याशी रेनू अधिकारी के अलावा मेयर डा. जोगेंद्र रौतेला दावेदारी जता चुके हैं। ऐसे में भाजपा के अंदर चल रही आपसी खींचतान को अन्य राजनीतिक दल बारीकी से देख रहे हैं।
से अभी भविष्य के गर्त में है कि भाजपा से तय होने वाला चेहरा अन्य दलों की बेचैनी बढ़ाएगा या उन्हें राहत देगा। सपा अब मतीन का विकल्प तलाश रही है। कुमाऊं में मतीन के नाम से ही सपा की पहचान थी। सपा के आगे अपनी पहचान बरकार रखने का संकट है।