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कलाकारों को एक मंच पर लाने और उनकी समस्याओं का समाधान करने का होगा प्रयास
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हल्द्वानी में एफटीआई में उत्तराखंड सांस्कृतिक मंच द्वारा आयोजित भेटघाट कार्यक्रम में कुमाऊं क?
हल्द्वानी। ‘झन दिया बौज्यू छाना बिलौरी, लागला बिलौरी का घाम’ जैसे सुप्रसिद्ध कुमाऊंनी लोक गीत की गायिका बीना तिवारी ने हल्द्वानी में आयोजित उत्तराखंड सांस्कृतिक मंच की भेट घाट परिचर्चा में पांच दशक पुराना यह गीत गुनगुनाया तो लोगों की यादें ताजा हो गईं। बीना तिवारी ने 1963 में जब इस गीत को आकाशवाणी में गाया गया था तब इसे काफी लोकप्रियता मिली थी।
उत्तराखंड सांस्कृतिक मंच की ओर से रविवार को एफटीआई प्रेक्षागृह में भेट घाट सांस्कृतिक परिचर्चा हुई। इसमें कुमाऊं के तमाम लोक कलाकार, साहित्यकार और रंगकर्मी एक मंच पर एकत्रित हुए। लोक गायिका बीना तिवारी और वरिष्ठ साहित्यकार जुगल किशोर पेटशाली समेत अतिथियों ने दीप जलाकर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। शुरुआत में विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य करने वाले लोगों को सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम में कलाकारों की समस्याओं और सरकार की ओर से कला के क्षेत्र में चलाई जा रही योजनाओं पर परिचर्चा की गई। आयोजकों ने कहा कि उत्तराखंड सांस्कृतिक मंच का मकसद कलाकारों की समस्याओं को हल करने के लिए एक मंच प्रदान करना, कलाकारों के बीच आपसी सामंजस्य स्थापित करना, कलाकारों को सरकारी योजनाओें का लाभ दिलाना और उत्तराखंड की विलुप्त हो रही संस्कृति को फिर से स्थापित करना है।
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वरिष्ठ साहित्यकार जुगल किशोर पेटशाली ने कुमाऊंनी भाषा में व्याख्यान देते हुए कहा कि आज बोलचाल की कुमाऊंनी भाषा ही शेष रह गई है। साहित्यिक कुमाऊंनी भाषा 95 फीसदी विलुप्त हो चुकी है। इसके संरक्षण की जरूरत है। लोक गायक प्रह्लाद मेहरा, सरोज आनंद, रमेश बिष्ट, डॉ. प्रभा पंत, हेमा हरबोला, नवीन टोलिया, कुसुम पांडे, लता कुंजवाल, हेम पंत, राकेश खनवाल, खुशी जोशी और गंभीर दार्मिक ने भी अनुभव साझा किए। प्लांट ऑर्बिट के गगन त्रिपाठी ने पौधरोपण के महत्व और कलाकारों के पर्यावरण क्षेत्र में योगदान के बारे में अपने विचार रखे। इस मौके पर रंगकर्मी हरीश चंद्र पांडे, रितेश जोशी, जगमोहन परगाई, नितेश बिष्ट, शंभू दत्त साहिल, गोविंद दिगारी, धीरज कांडपाल, संदीप, मोहन पांडे, इंदर आर्य, नीरज चुफाल आदि लोग मौजूद रहे। संचालन हेमंत बिष्ट और गुंजन जोशी ने किया।
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उत्तराखंड सांस्कृतिक मंच की ओर से रविवार को एफटीआई प्रेक्षागृह में भेट घाट सांस्कृतिक परिचर्चा हुई। इसमें कुमाऊं के तमाम लोक कलाकार, साहित्यकार और रंगकर्मी एक मंच पर एकत्रित हुए। लोक गायिका बीना तिवारी और वरिष्ठ साहित्यकार जुगल किशोर पेटशाली समेत अतिथियों ने दीप जलाकर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। शुरुआत में विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य करने वाले लोगों को सम्मानित किया गया।
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कार्यक्रम में कलाकारों की समस्याओं और सरकार की ओर से कला के क्षेत्र में चलाई जा रही योजनाओं पर परिचर्चा की गई। आयोजकों ने कहा कि उत्तराखंड सांस्कृतिक मंच का मकसद कलाकारों की समस्याओं को हल करने के लिए एक मंच प्रदान करना, कलाकारों के बीच आपसी सामंजस्य स्थापित करना, कलाकारों को सरकारी योजनाओें का लाभ दिलाना और उत्तराखंड की विलुप्त हो रही संस्कृति को फिर से स्थापित करना है।
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वरिष्ठ साहित्यकार जुगल किशोर पेटशाली ने कुमाऊंनी भाषा में व्याख्यान देते हुए कहा कि आज बोलचाल की कुमाऊंनी भाषा ही शेष रह गई है। साहित्यिक कुमाऊंनी भाषा 95 फीसदी विलुप्त हो चुकी है। इसके संरक्षण की जरूरत है। लोक गायक प्रह्लाद मेहरा, सरोज आनंद, रमेश बिष्ट, डॉ. प्रभा पंत, हेमा हरबोला, नवीन टोलिया, कुसुम पांडे, लता कुंजवाल, हेम पंत, राकेश खनवाल, खुशी जोशी और गंभीर दार्मिक ने भी अनुभव साझा किए। प्लांट ऑर्बिट के गगन त्रिपाठी ने पौधरोपण के महत्व और कलाकारों के पर्यावरण क्षेत्र में योगदान के बारे में अपने विचार रखे। इस मौके पर रंगकर्मी हरीश चंद्र पांडे, रितेश जोशी, जगमोहन परगाई, नितेश बिष्ट, शंभू दत्त साहिल, गोविंद दिगारी, धीरज कांडपाल, संदीप, मोहन पांडे, इंदर आर्य, नीरज चुफाल आदि लोग मौजूद रहे। संचालन हेमंत बिष्ट और गुंजन जोशी ने किया।