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जिम कार्बेट के बाद दूसरी यादगार घटना

Fri, 21 Oct 2016 01:39 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो रामनगर
अमर उजाला ब्यूरो रामनगर Updated Fri, 21 Oct 2016 01:39 AM IST
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Another memorable event after Jim Corbett
जिम कॉर्बेट - फोटो : प्रतीकात्मक

जिम कार्बेट ने चंपावत, पवलगढ़, ओखलकांडा आदि इलाकों में आदमखोर बाघों को मार जनता को उनके आतंक से निजात दिलाई थी। जिम कार्बेट का जिक्र वन्यजीवों खासकर बाघ के लोगों के बीच हिंसक होने पर जरूर आता है।

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कार्बेट ने जहां हिंसक वन्यजीवों को पैदल, मचानों से और हाथियों से हाका लगवाकर कम संसाधनों के बीच मार गिराकर अपना नाम इतिहास में दर्ज कराया था। वहीं, तराई पश्चिमी वन प्रभाग के आमपोखरा रेंज की आदमखोर बाघिन ने भी 45 दिनों तक विभाग की नाक में दम कर जनता में भय पैदा कर दिया था।
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पश्चिमी वृत्त के सीएफ डॉ. पराग मधुकर धकाते कहते हैं कि विभाग के इतिहास में इस आदमखोर बाघिन की घटना दर्ज की जाएगी कि इसे मारने के लिए 45 दिन लग गए।

मेरे लिए बाघिन नही नागिन थी

क्षेत्र में आतंक का सबब बनी आदमखोर बाघिन ने गांव गोरखपुर में परमजीत की जान ले ली थी। बृहस्पतिवार को बाघिन का खात्मा होने पर परमजीत की पत्नी मंजीत कौर बाघिन के शव के पास पहुंची और काफी देर तक उसे देखती रही।
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जब उसे विभाग वाले उसे वहां से हटाने लगे तब उसने कहा ‘ये मेरे लिए बाघिन नही नागिन है इसने मेरे पति को डंस कर मुझे और मेरे बच्चों को हमेशा-हमेशा के लिए उनसे दूर कर दिया।’ उसके बाद वह फूट फूटकर रोने लगी।

विभाग को कई अनुभव दे गई आदमखोर बाघिन

45 दिनों से क्षेत्र में दहशत का पर्याय बनी आदमखोर बाघिन ने वन विभाग को कई अनुभव दे गई। शुरू में विभाग ने इसे हल्के में लेते हुए गश्त शुरू की। जैसे-जैसे क्षेत्र में बाघिन का आतंक बढ़ता चला गया, वैसे-वैसे ग्रामीणों का आक्रोश भी बढ़ा।

पहले तो विभाग को पता ही नहीं चला कि यह आदमखोर बाघिन है या तेंदुआ। इस बीच तेंदुए के फुट प्रिंट मिलने पर तेंदुए को ही आदमखोर घोषित कर दिया गया। उसे मारने की इजाजत भी ले ली गई। लेकिन, बाद में हुई जांच के बाद पीसीसीएफ ने खुलासा किया कि आतंक मचाने वाली एक बाघिन है।

इसमें भी विभाग की काफी किरकिरी हुई। वहीं विभागीय अधिकारियों को भी बीच-बीच में लोगों के गुस्से का सामना करना पड़ा। कभी कार्बेट के निदेशक और तराई की डीएफओ को कई घंटे धूप में खड़ा रहना पड़ा तो कभी कर्मियों को तल्ला कानियां में अभियान के दौरान भागी बाघिन के बाद अपने कपड़े फटवाने के साथ ही मार तक खानी पड़ी।


इतना ही नहीं गोरखपुुर कांड में तो डीएफओ तक को दूसरे के घर में शरण लेनी पड़ी थी। वहीं, कई ग्रामीणों ने अभियान के लिए काफी मदद भी की और वनकर्मियों के साथ ही शिकारियों की भी हर संभव मदद के लिए हर समय साथ खड़े रहे।

बृहस्पतिवार को घटना समय दर समय
साढे़ पांच बजे कैमरा ट्रैप चेक हुए।
साढे छह बजे फुट प्रिंट मिले।
सात बजे सभी टीमों को सूचना देकर बुुलाया गया।
आठ बजे से क्षेत्र की घेराबंदी की गई।
जो दस बजे पूरी हुई।
साढे़ दस बजे से अभियान शुरू किया।
साढ़े ग्यारह बजे बाघिन नजर आई।
12 बजे बाघिन की घेराबंदी की गई।
सवा बारह बजे बाघिन तीन गोलियों में ढेर हो गई।

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