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पर्दे लगाकर बचाई है एचएमटी की लाज
Nainital
Updated Fri, 20 Dec 2013 05:49 AM IST
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हल्द्वानी। घर मंदिर ही नहीं होता, खंडहर भी हो सकता है। रानीबाग स्थित एचएमटी कालोनी में खड़ी भुतहा इमारतें इस बात की तस्दीक करती हैं कि मजबूरी में मौत के साये में भी रहना पड़ सकता है। मजबूरी अपने घर में हो तो अखरती भी है और आक्रोश भी पैदा करती है। यही आक्रोश कभी कलाई की शान घड़ी तैयार करने वाली एचएमटी कालोनी के 200 परिवारों के आंखों में भी दिखता है। जिन्होंने पर्दे लगाकर एचएमटी की लाज बचाई है। यह संख्या और अधिक होती यदि 150 परिवारों ने कालोनी नहीं छोड़ी होती। दर्द इतना ही होता तो शायद पहाड़ के सीधे-सादे लोग इसे सहन कर जाते लेकिन यहां तो तनख्वाह भी नौ महीने से नहीं मिली।
बार-बार एचएमटी के इतिहास पर जाने की जरूरत नहीं। वर्तमान बदहाली पर गौर करते हैं। शुरुआती दौर में देशभर में 20 लाख घड़ियां साल में सप्लाई करने वाली फैक्ट्री का उत्पादन अब बमुश्किल 20 हजार है। जबकि दक्षिण भारत में एचएमटी का वर्चस्व आज भी बना हुआ है क्याेंकि वहां के जनप्रतिनिधि अपने लोगों की परवाह करते हैं। कभी हल्द्वानी और आसपास के 2500 से अधिक लोगों को रोजगार देने वाली कंपनी में आज करीब 530 कर्मचारी हैं। क्योंकि इन्हें उम्र ने कहीं जाने लायक नहीं छोड़ा। जवानी एचएमटी खा गई अब अस्तित्व बचाने की लड़ाई है।
2003 से एचएमटी की बर्बादी की असल शुरुआत हुई। 530 कर्मचारियों में करीब 150 के परिवार कालोनी की जर्जर हालत देख जा चुके हैं। दो इमारतें पूरी तरह भुतहा हो चुकी हैं। दरवाजे-खिड़की तक अपनी जगह नहीं हैं। 200 परिवारों के सामने इस खंडहर के अलावा विकल्प नहीं। क्योंकि परिवार पहले ही पीएफ के भरोसे हैं। कालोनी के गिरीश पांडे बताते हैं कि छह महीने से पहले कभी वेतन नहीं आता। ऐसे में कालोनी छोड़कर किराये में नहीं रहा सकते। वेतन निकलवाने के लिए भी नेताओं के चक्कर लगाने पड़ते हैं। दबाव बनने पर ही तनख्वाह निकल पाती है। अनूप सिंह बताते हैं कि इस बार नौ महीने से वेतन नहीं आया है और दूसरा कोई रोजगार नहीं। सुंदर कांडपाल कहते हैं कि कालोनी के अधिकांश परिवार आज घर के मुखिया के नहीं बच्चों और महिलाओं के रोजगार पर चल रहे हैं। एमसी मठपाल, नरेंद्र सिंह नौलिया और ऐसे कई कर्मचारी हैं जो इस दर्द से रोज रूबरू होते हैं।
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कांग्रेस के नेताओं के सपनों की भी बेकद्री है
रानीबाग स्थिति एचएमटी फैक्ट्री की बदहाली कांग्रेस को खड़ा करने वाले नेताओं के सपनों की भी बेकद्री है। करीब 28 साल पहले पंडित जवाहर लाल नेहरू के जन्मदिवस पर 14 नवंबर 1985 को राजीव गांधी ने पंडित नारायण दत्त तिवारी के इस सपने का पंख लगाए थे। कांग्रेस के तीन दिग्गजों के नाम से जुड़ी यह फैक्ट्री आज जब बर्बादी की कगार पर है तब भी देश-प्रदेश में कांग्रेस की सरकार है। हालांकि आज चेहरे बदल गए हैं। सोच बदल गई है।
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बार-बार एचएमटी के इतिहास पर जाने की जरूरत नहीं। वर्तमान बदहाली पर गौर करते हैं। शुरुआती दौर में देशभर में 20 लाख घड़ियां साल में सप्लाई करने वाली फैक्ट्री का उत्पादन अब बमुश्किल 20 हजार है। जबकि दक्षिण भारत में एचएमटी का वर्चस्व आज भी बना हुआ है क्याेंकि वहां के जनप्रतिनिधि अपने लोगों की परवाह करते हैं। कभी हल्द्वानी और आसपास के 2500 से अधिक लोगों को रोजगार देने वाली कंपनी में आज करीब 530 कर्मचारी हैं। क्योंकि इन्हें उम्र ने कहीं जाने लायक नहीं छोड़ा। जवानी एचएमटी खा गई अब अस्तित्व बचाने की लड़ाई है।
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2003 से एचएमटी की बर्बादी की असल शुरुआत हुई। 530 कर्मचारियों में करीब 150 के परिवार कालोनी की जर्जर हालत देख जा चुके हैं। दो इमारतें पूरी तरह भुतहा हो चुकी हैं। दरवाजे-खिड़की तक अपनी जगह नहीं हैं। 200 परिवारों के सामने इस खंडहर के अलावा विकल्प नहीं। क्योंकि परिवार पहले ही पीएफ के भरोसे हैं। कालोनी के गिरीश पांडे बताते हैं कि छह महीने से पहले कभी वेतन नहीं आता। ऐसे में कालोनी छोड़कर किराये में नहीं रहा सकते। वेतन निकलवाने के लिए भी नेताओं के चक्कर लगाने पड़ते हैं। दबाव बनने पर ही तनख्वाह निकल पाती है। अनूप सिंह बताते हैं कि इस बार नौ महीने से वेतन नहीं आया है और दूसरा कोई रोजगार नहीं। सुंदर कांडपाल कहते हैं कि कालोनी के अधिकांश परिवार आज घर के मुखिया के नहीं बच्चों और महिलाओं के रोजगार पर चल रहे हैं। एमसी मठपाल, नरेंद्र सिंह नौलिया और ऐसे कई कर्मचारी हैं जो इस दर्द से रोज रूबरू होते हैं।
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कांग्रेस के नेताओं के सपनों की भी बेकद्री है
रानीबाग स्थिति एचएमटी फैक्ट्री की बदहाली कांग्रेस को खड़ा करने वाले नेताओं के सपनों की भी बेकद्री है। करीब 28 साल पहले पंडित जवाहर लाल नेहरू के जन्मदिवस पर 14 नवंबर 1985 को राजीव गांधी ने पंडित नारायण दत्त तिवारी के इस सपने का पंख लगाए थे। कांग्रेस के तीन दिग्गजों के नाम से जुड़ी यह फैक्ट्री आज जब बर्बादी की कगार पर है तब भी देश-प्रदेश में कांग्रेस की सरकार है। हालांकि आज चेहरे बदल गए हैं। सोच बदल गई है।