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दो घंटे में उजड़ा 30 साल का ‘पवन हंस’
Nainital
Updated Mon, 24 Jun 2013 05:30 AM IST
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नैनीताल। ‘पवन हंस’ 30 साल से राम सिंह बिष्ट के जीवन का साथी था और ऐसे 150 पवन हंस थे गौरीकुंड के गरमकुंड में। जिनसे न जाने कितनों का परिवार चलता था, पर प्रकृति के एक तूफानी वेग ने महज 120 मिनट में राम सिंह के साथ ही उन जैसे सैकड़ों लोगों की आर्थिकी के मजबूत साधन को मटियामेट कर डाला। वर्षा के तीव्र वेग में अपने ‘पवन हंस’ होटल के डूबने के बाद पानी की जानलेवा रफ्तार से बचने के लिए जब राम सिंह अपने बेटे विजय के अलावा 5000 लोगों के साथ भाग रहे थे तो मौत कितनी भयावह होती है ये तब ही मालूम चला। बहरहाल गौरीकुंड को बर्बाद करने वाली बारिश इन दो पिता-पुत्रों के रिश्ते की डोर को नहीं तोड़ पाई और 7 दिन उजड़े हुए खानाबदोशों की तरह जंगलों में भटकते हुए ये दोनों जिंदगी को अपने साथ खींच लाए।
नैनीताल के सात नंबर निवासी राम सिंह 30 साल से गरमकुंड का जीवन जीते आए हैं, लेकिन इन 30 वर्षों में उस क्षेत्र से जुदाई ऐसी दर्दनाक होगी ये इस शख्स ने कभी बंद आंखों के सपने में भी नहीं देखा था। 16 जून का दिन था और समय शाम के ठीक 6.30 बजे। बारिश का वेग धरती पर ऐसी चोट करता था कि उसकी आवाज बंद दरवाजों को चीरते हुए कमरे के भीतर तक खौफ पैदा करती थी। डेढ़ घंटे तक यही शोर चला और 8.30 बजे वहां की 150 दुकानें धरती धंसने के साथ ढहती चली गई। राम सिंह का पवन हंस भी उन 150 दुकानों का हिस्सा था। बस फिर क्या था, राम सिंह अपने बेटे विजय को लेकर ऊंचाई की तरफ भागे।
रात में गौरीगांव पहुंचे। खेत में रात गुजारी और खाने के लिए बिस्किट से काम चलाया। गौरीगांव के लोगों ने जितनी हो सकी, खाने-पीने में मदद की। हेलीकॉप्टर से बिस्किट गिरते तो लोग टूट पड़ते। गौरीगांव में तब एक नहीं पांच हजार लोग थे। कुछ भूख से तड़पकर मरे तो कुछ की मौत प्रकृति की इस क्रृरता को देखकर हुई, पर जो बचे वो देश के फौजियों को भगवान से कम नहीं मानते। अमर उजाला से रविवार को भेंट में बिष्ट ने जब अपना यह दर्द बयां किया तो आंखें छलक पड़ी। मई से अक्तूबर तक राम सिंह वहां होटल चलाकर वह अपने परिवार का गुजर-बसर करते हैं। उनका बड़ा बेटा विजय उनका हाथ बंटाता है तथा छोटा बेटा रवि देहरादून में बीसीए कर रहा है। पत्नी कल्पना नैनीताल में रहती हैं। करीब आठ लाख रुपये की संपत्ति खत्म हो गई। 20 जून फाटा पहुंचने के बाद गुप्तकाशी, हरिद्वार होते हुए वह नैनीताल पहुंचे हैं। उन्हें अपने एक पवन हंस के उजड़ने का गम नहीं, बल्कि उस पूरी दुनिया का दुख है जो गौरीकुंड की शान थी, पर वहां अब बड़े पत्थर हैं, मिट्टी का ढेर है और मकानों का मलबा। एक खयाल बार-बार राम सिंह को सताता है कि वो स्वरूप जाने अब कब लौटकर आएगा गौरीकुंड और उस जैसे गढ़वाल के अन्य गांवों का।
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नैनीताल के सात नंबर निवासी राम सिंह 30 साल से गरमकुंड का जीवन जीते आए हैं, लेकिन इन 30 वर्षों में उस क्षेत्र से जुदाई ऐसी दर्दनाक होगी ये इस शख्स ने कभी बंद आंखों के सपने में भी नहीं देखा था। 16 जून का दिन था और समय शाम के ठीक 6.30 बजे। बारिश का वेग धरती पर ऐसी चोट करता था कि उसकी आवाज बंद दरवाजों को चीरते हुए कमरे के भीतर तक खौफ पैदा करती थी। डेढ़ घंटे तक यही शोर चला और 8.30 बजे वहां की 150 दुकानें धरती धंसने के साथ ढहती चली गई। राम सिंह का पवन हंस भी उन 150 दुकानों का हिस्सा था। बस फिर क्या था, राम सिंह अपने बेटे विजय को लेकर ऊंचाई की तरफ भागे।
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रात में गौरीगांव पहुंचे। खेत में रात गुजारी और खाने के लिए बिस्किट से काम चलाया। गौरीगांव के लोगों ने जितनी हो सकी, खाने-पीने में मदद की। हेलीकॉप्टर से बिस्किट गिरते तो लोग टूट पड़ते। गौरीगांव में तब एक नहीं पांच हजार लोग थे। कुछ भूख से तड़पकर मरे तो कुछ की मौत प्रकृति की इस क्रृरता को देखकर हुई, पर जो बचे वो देश के फौजियों को भगवान से कम नहीं मानते। अमर उजाला से रविवार को भेंट में बिष्ट ने जब अपना यह दर्द बयां किया तो आंखें छलक पड़ी। मई से अक्तूबर तक राम सिंह वहां होटल चलाकर वह अपने परिवार का गुजर-बसर करते हैं। उनका बड़ा बेटा विजय उनका हाथ बंटाता है तथा छोटा बेटा रवि देहरादून में बीसीए कर रहा है। पत्नी कल्पना नैनीताल में रहती हैं। करीब आठ लाख रुपये की संपत्ति खत्म हो गई। 20 जून फाटा पहुंचने के बाद गुप्तकाशी, हरिद्वार होते हुए वह नैनीताल पहुंचे हैं। उन्हें अपने एक पवन हंस के उजड़ने का गम नहीं, बल्कि उस पूरी दुनिया का दुख है जो गौरीकुंड की शान थी, पर वहां अब बड़े पत्थर हैं, मिट्टी का ढेर है और मकानों का मलबा। एक खयाल बार-बार राम सिंह को सताता है कि वो स्वरूप जाने अब कब लौटकर आएगा गौरीकुंड और उस जैसे गढ़वाल के अन्य गांवों का।
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