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फल उत्पादन पर इस बार पड़ी मौसम की मार,
Updated Sun, 14 Oct 2018 11:21 PM IST
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रानीखेत (अल्मोड़ा)। एक तो फलों के उत्पादन की स्थिति पहले ही ठीक नहीं थी, उस पर इस बार मौसम की मार के चलते लगभग पूरे प्रदेश में फल उत्पादन बुरी तरह से प्रभावित हो गया है। ओलावृष्टि के चलते अधिकांश फल या तो गिर गए, जो बचे थे वह दागी होने के कारण बरबाद हो गए। उद्यान निदेशालय चौबटिया से मिली जानकारी के अनुसार मौसम की मार के चलते इस बार फलों को 80 से 90 फीसदी नुकसान हो चुका है। सेब उत्पादन भी इस बार पहले के मुकाबले कम रहा है।
राज्य बनने के बाद औद्यानिकी क्षेत्र में नई क्रांति की उम्मीद थी मगर ठोस नीति नहीं बन पाने के कारण आधुनिक शोध और तकनीकों का लाभ किसानों तक नहीं पहुंच पा रहा है। पहाड़ के औद्यानिकी विकास के लिए 1953 में यहां चौबटिया में पृथक निदेशालय की स्थापना हुई। तत्कालीन संस्थापक निदेशक विक्टर साने द्वारा पर्वतीय क्षेत्र में शीतोष्ण फल प्रजातियों के साथ ही घाटियों में आम, मसाला, सब्जी, शहद, पुष्प आदि के उत्पादन की भी नीतियां बनाई। उत्तर प्रदेश शासनकाल तक यहां से काश्तकारों को औद्यानिकी के क्षेत्र में काफी लाभ मिलता था।
वैज्ञानिक और उनकी टीमें गांव-गांव जाकर काश्तकारों को फल, सब्जी उत्पादन के लिए नई तकनीकें बताते थे लेकिन राज्य बनने के बाद औद्यानिक विकास की उम्मीदें भी धीरे-धीरे धराशायी हो गई। फल उत्पादन के क्षेत्र में भी लोगों को खास लाभ मिलता नजर नहीं आ रहा है। इस बार मौसम की मार की चलते फल उत्पादन बुरी तरह से प्रभावित हो गया। सेब, आडू, प्लम, खुमानी, बादाम के फलों पर ओलावृष्टि की मार पड़ी है। सेब की फसल भी प्रभावित हुई है। निदेशालय के अधिकारियों के अनुसार सेब उत्पादन और वर्षों की अपेक्षा कम हुआ है। सबसे अधिक सेब का उत्पादन उत्तरकाशी में होता है, लेकिन वहां भी मौसम की मार के चलते उत्पादन प्रभावित हुआ है।
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कोट
मौसम की मार और तापमान की कमी के चलते सेब उत्पादन इस बार कम रहा है। अन्य फलों पर भी ओलावृष्टि की मार पड़ी है। मालरोड, ताड़ीखेत, अल्मोड़ा और द्वाराहाट में स्थापित फ्रूट प्रोसेसिंग यूनिटें काम कर रही हैं। वहां काश्तकार फलों से अचार, मुरब्बा आदि बनाने का कार्य करते हैं।
-चंदन राम, उद्यान अधीक्षक, निदेशालय, चौबटिया।
राज्य बनने के बाद औद्यानिकी क्षेत्र में नई क्रांति की उम्मीद थी मगर ठोस नीति नहीं बन पाने के कारण आधुनिक शोध और तकनीकों का लाभ किसानों तक नहीं पहुंच पा रहा है। पहाड़ के औद्यानिकी विकास के लिए 1953 में यहां चौबटिया में पृथक निदेशालय की स्थापना हुई। तत्कालीन संस्थापक निदेशक विक्टर साने द्वारा पर्वतीय क्षेत्र में शीतोष्ण फल प्रजातियों के साथ ही घाटियों में आम, मसाला, सब्जी, शहद, पुष्प आदि के उत्पादन की भी नीतियां बनाई। उत्तर प्रदेश शासनकाल तक यहां से काश्तकारों को औद्यानिकी के क्षेत्र में काफी लाभ मिलता था।
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वैज्ञानिक और उनकी टीमें गांव-गांव जाकर काश्तकारों को फल, सब्जी उत्पादन के लिए नई तकनीकें बताते थे लेकिन राज्य बनने के बाद औद्यानिक विकास की उम्मीदें भी धीरे-धीरे धराशायी हो गई। फल उत्पादन के क्षेत्र में भी लोगों को खास लाभ मिलता नजर नहीं आ रहा है। इस बार मौसम की मार की चलते फल उत्पादन बुरी तरह से प्रभावित हो गया। सेब, आडू, प्लम, खुमानी, बादाम के फलों पर ओलावृष्टि की मार पड़ी है। सेब की फसल भी प्रभावित हुई है। निदेशालय के अधिकारियों के अनुसार सेब उत्पादन और वर्षों की अपेक्षा कम हुआ है। सबसे अधिक सेब का उत्पादन उत्तरकाशी में होता है, लेकिन वहां भी मौसम की मार के चलते उत्पादन प्रभावित हुआ है।
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मौसम की मार और तापमान की कमी के चलते सेब उत्पादन इस बार कम रहा है। अन्य फलों पर भी ओलावृष्टि की मार पड़ी है। मालरोड, ताड़ीखेत, अल्मोड़ा और द्वाराहाट में स्थापित फ्रूट प्रोसेसिंग यूनिटें काम कर रही हैं। वहां काश्तकार फलों से अचार, मुरब्बा आदि बनाने का कार्य करते हैं।
-चंदन राम, उद्यान अधीक्षक, निदेशालय, चौबटिया।