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मैदान के अभाव में रानीखेत के बड़े उत्सवों पर लगा ग्रहण
Updated Tue, 13 Jun 2017 10:24 PM IST
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मैदान के अभाव में रानीखेत के बड़े उत्सवों पर ग्रहण
रानीखेत (अल्मोड़ा)। पर्यटन नगरी में अंग्रेजों द्वारा शुरू की गई बड़े उत्सवों की परंपरा अब पूरी तरह से दम तोड़ चुकी हैं। सामाजिक, सांस्कृतिक और खेल गतिविधियों का प्रतीक ग्रीष्मोत्सव और शरदोत्सव भी गुजरे जमाने की बात हो गई है, मैदान के अभाव में एक दशक से इन उत्सवों के आयोजन में ठहराव आ गया है। उत्सवों के माध्यम से जहां स्थानीय विद्यालयी बच्चों को सांस्कृतिक गतिविधियों में प्रतिभा दिखाने का मौका मिलता था, वहीं खेल प्रतिभाएं भी उभरकर सामने आती थीं। उत्सव नहीं होने से खास तौर पर बच्चों में खासी निराशा है।
रानीखेत में बड़े मेलों की परंपरा आजादी से पूर्व 1935 में शुरू हो गई थी। तब अंग्रेजों की देखरेख में रानीखेत वीक और सितंबर वीक के नाम से उत्सव मनाए जाते थे। घुड़दौड़ और विदेशी संस्कृति से संबंधित कार्यक्रम होते थे। 1960 में इन मेलों के नाम क्रमश: ग्रीष्मोत्सव और शरदोत्सव रखे गए। 1958 में इन उत्सवों का उद्घाटन भारत रत्न गोविंद बल्लभ पंत ने किया। 1970 में पूर्व राष्ट्रपति स्व. वीवी गिरि, 1971 में तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी, 1975 में यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. हेमवती नंदन बहुगुणा, 1980 में स्व. केसी पंत, 1994 में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नवी आजाद ने इन मेलों का उद्घाटन किया। राज्य बनने के बाद 2003 में मैदान की अनुपलब्धता की दुहाई देकर दोनों मेलों को अचानक बंद कर दिया गया। स्थानीय नागरिकों के सहयोग से 2015 में ग्रीष्मोत्सव हुआ, लेकिन इसके बाद फिर मैदान की समस्या आड़े आ गई, पिछले दो सालों से यह आयोजन भी ठप है। इसका खामियाजा खेल और सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़ी उदीयमान प्रतिभाओं को भुगतना पड़ रहा है।
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रानीखेत (अल्मोड़ा)। पर्यटन नगरी में अंग्रेजों द्वारा शुरू की गई बड़े उत्सवों की परंपरा अब पूरी तरह से दम तोड़ चुकी हैं। सामाजिक, सांस्कृतिक और खेल गतिविधियों का प्रतीक ग्रीष्मोत्सव और शरदोत्सव भी गुजरे जमाने की बात हो गई है, मैदान के अभाव में एक दशक से इन उत्सवों के आयोजन में ठहराव आ गया है। उत्सवों के माध्यम से जहां स्थानीय विद्यालयी बच्चों को सांस्कृतिक गतिविधियों में प्रतिभा दिखाने का मौका मिलता था, वहीं खेल प्रतिभाएं भी उभरकर सामने आती थीं। उत्सव नहीं होने से खास तौर पर बच्चों में खासी निराशा है।
रानीखेत में बड़े मेलों की परंपरा आजादी से पूर्व 1935 में शुरू हो गई थी। तब अंग्रेजों की देखरेख में रानीखेत वीक और सितंबर वीक के नाम से उत्सव मनाए जाते थे। घुड़दौड़ और विदेशी संस्कृति से संबंधित कार्यक्रम होते थे। 1960 में इन मेलों के नाम क्रमश: ग्रीष्मोत्सव और शरदोत्सव रखे गए। 1958 में इन उत्सवों का उद्घाटन भारत रत्न गोविंद बल्लभ पंत ने किया। 1970 में पूर्व राष्ट्रपति स्व. वीवी गिरि, 1971 में तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी, 1975 में यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. हेमवती नंदन बहुगुणा, 1980 में स्व. केसी पंत, 1994 में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नवी आजाद ने इन मेलों का उद्घाटन किया। राज्य बनने के बाद 2003 में मैदान की अनुपलब्धता की दुहाई देकर दोनों मेलों को अचानक बंद कर दिया गया। स्थानीय नागरिकों के सहयोग से 2015 में ग्रीष्मोत्सव हुआ, लेकिन इसके बाद फिर मैदान की समस्या आड़े आ गई, पिछले दो सालों से यह आयोजन भी ठप है। इसका खामियाजा खेल और सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़ी उदीयमान प्रतिभाओं को भुगतना पड़ रहा है।
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