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ढाक का अस्तित्व खतरे में
Updated Fri, 09 Feb 2018 02:36 AM IST
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हल्द्वानी। ढाक का अस्तित्व खतरे में है। जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव ही है कि ढाक के दो महीने पहले ही समय से पूर्व फूल खिलने से बीज बनना बंद हो गए हैं। इससे यह प्रजाति विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गई है।
वन अनुसंधान केंद्र के मुताबिक ढाक, फैबेसी कुल का है और इसका वनस्पति नाम ब्यूटिया मोनोस्पर्मा है। प्रभारी रेंजर मदन सिंह बिष्ट का कहना है कि वह चार सालों से ढाक के बीजों के एकत्रीकरण पर शोध कर रहे थे लेकिन बीज नहीं मिल पा रहे हैं। उन्होंने आशंका जताई कि बंदर, पक्षी वगैरह गिरा देते होंगे। फिर उन्होंने घने जंगलों में ढाक के बीजों का एकत्रीकरण करने की कोशिश की लेकिन बीज नहीं मिले। शोध में बिष्ट ने यह भी पाया कि आमतौर पर ढाक के फूल मार्च (वसंत) में खिलते हैं लेकिन फरवरी अंत में फूल खिले। जैसे-जैसे साल बीतते गये ढाक के फूल फरवरी अंत, मध्य और प्रारंभ में पहुंचा। फिर जनवरी अंत, मध्य और अब प्रारंभ में ही फूल खिलने लगे हैं। यह साफ संकेत है कि मार्च में होने वाला मौसम का तापमान जनवरी में ही वनस्पतियों को मिल जा रहा है जिसकी वजह से ढाक के फूल समय से दो माह पहले ही खिल गए। नतीजा यह हुआ कि समय से पूर्व फूल बनने से बीज बने ही नहीं। बीज बनना बंद होने से ढाक की प्रजाति का अस्तित्व पर ही खतरा मंडरा गया है।
मार्च के बजाय जनवरी में फूल खिलने से नहीं बन रहे बीज
वन अनुसंधान के प्रभारी रेंजर के शोध में हुआ खुलासा
कलम से तैयार की जा रही नर्सरी
वन अनुसंधान केंद्र ढाक को विलुप्त होने से बचाने के लिए कलम से नर्सरी तैयार कर रहा है। कलम से पौधे तैयार करने की कोशिश की जा रही है ताकि अन्य वनस्पतियों की तरह यह भी विलुप्त न हो जाए। ढाक प्रदेश में अधिकतर तराई भाबर के जंगलों में मिलता है।
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जलवायु परिवर्तन का असर
उत्तराखंड में जलवायु परिवर्तन का असर कई वनस्पतियों पर हो रहा है। अभी तक राज्य वृक्ष बुरांश भी समय से पहले खिलने लगा है। इसी तरह काफल, सेमल, हिसालु, किल्मोड़ा, भी समय से दो-तीन माह पूर्व खिलने लगे हैं।
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वन अनुसंधान केंद्र के मुताबिक ढाक, फैबेसी कुल का है और इसका वनस्पति नाम ब्यूटिया मोनोस्पर्मा है। प्रभारी रेंजर मदन सिंह बिष्ट का कहना है कि वह चार सालों से ढाक के बीजों के एकत्रीकरण पर शोध कर रहे थे लेकिन बीज नहीं मिल पा रहे हैं। उन्होंने आशंका जताई कि बंदर, पक्षी वगैरह गिरा देते होंगे। फिर उन्होंने घने जंगलों में ढाक के बीजों का एकत्रीकरण करने की कोशिश की लेकिन बीज नहीं मिले। शोध में बिष्ट ने यह भी पाया कि आमतौर पर ढाक के फूल मार्च (वसंत) में खिलते हैं लेकिन फरवरी अंत में फूल खिले। जैसे-जैसे साल बीतते गये ढाक के फूल फरवरी अंत, मध्य और प्रारंभ में पहुंचा। फिर जनवरी अंत, मध्य और अब प्रारंभ में ही फूल खिलने लगे हैं। यह साफ संकेत है कि मार्च में होने वाला मौसम का तापमान जनवरी में ही वनस्पतियों को मिल जा रहा है जिसकी वजह से ढाक के फूल समय से दो माह पहले ही खिल गए। नतीजा यह हुआ कि समय से पूर्व फूल बनने से बीज बने ही नहीं। बीज बनना बंद होने से ढाक की प्रजाति का अस्तित्व पर ही खतरा मंडरा गया है।
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मार्च के बजाय जनवरी में फूल खिलने से नहीं बन रहे बीज
वन अनुसंधान के प्रभारी रेंजर के शोध में हुआ खुलासा
कलम से तैयार की जा रही नर्सरी
वन अनुसंधान केंद्र ढाक को विलुप्त होने से बचाने के लिए कलम से नर्सरी तैयार कर रहा है। कलम से पौधे तैयार करने की कोशिश की जा रही है ताकि अन्य वनस्पतियों की तरह यह भी विलुप्त न हो जाए। ढाक प्रदेश में अधिकतर तराई भाबर के जंगलों में मिलता है।
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जलवायु परिवर्तन का असर
उत्तराखंड में जलवायु परिवर्तन का असर कई वनस्पतियों पर हो रहा है। अभी तक राज्य वृक्ष बुरांश भी समय से पहले खिलने लगा है। इसी तरह काफल, सेमल, हिसालु, किल्मोड़ा, भी समय से दो-तीन माह पूर्व खिलने लगे हैं।