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अखवारों और टीवी चैनलों की साहित्य के सृजन व संरक्षण में अहम भूमिका:मदन

Mon, 21 Aug 2017 02:35 AM IST
Updated Mon, 21 Aug 2017 02:35 AM IST
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अखवारों और टीवी चैनलों की साहित्य के सृजन व संरक्षण में अहम भूमिका:मदन
नैनीताल। वरिष्ठ कवि मदन कश्यप ने कहा कि अखबारों, टीवी चैनलों को समाज का प्रहरी होने के नाते सामाजिक मुद्दों को उठाने के साथ ही साहित्य के सृजन, संरक्षण के लिए पहल करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि साहित्य मूल संस्कृति को बचाने का सशक्त माध्यम है।
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कश्यप रविवार को नैनीताल में गिर्दा-वीरेन दा स्मृति कवि सम्मेलन में भाग लेने पहुंचे थे। उन्होंने कहा कि वर्तमान दौर में साहित्य का सृजन तो बहुत हो रहा है लेकिन बाजारवाद की व्यवस्था ने पुस्तकों को काफी महंगा कर दिया है, जिसके चलते पुस्तकें पाठक के पास तक नहीं पहुंच पा रही हैं। कहा कि हिंदी साहित्य पढ़ने वाला बहुत बड़ा तबका आर्थिक रूप से कमजोर है। हालत यह है कि हिंदी साहित्य पढ़ने वाले अधिकतर लोग या तो ग्रामीण क्षेत्र के हैं या फिर दलित, पिछड़े वर्ग से हैं। कहा कि वर्तमान दौर में साहित्य को सुनने वाले वर्ग का बाजारीकरण हो गया है लेकिन प्रवचन कभी भी साहित्य नहीं बन सकता है। कश्यप ने कहा कि साहित्य में समाज के दर्द का समावेश होना बहुत जरूरी है। कहा कि साहित्य में बदलाव धीमी गति से होता है जबकि उपभोक्तावादी इस दौर में टीवी चैनल रोजाना नए प्रयोग कर जनता के सामने प्रस्तुत कर रहे हैं।
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श्रेष्ठ साहित्य सृजन के साथ ही उसे पाठक तक पहुंचाना जिम्मेदारी

नैनीताल। कवि, साहित्यकार कपिलेश भोज, तारा चंद्र त्रिपाठी ने कहा कि यदि बचपन से ही साहित्य के प्रति रुचि उत्पन्न नहीं होती है तो शिक्षा पूर्ण करने के बाद भी व्यक्ति साहित्य को पढ़ने की चेष्टा नहीं करता है। कहा कि हमें विद्यार्थी में प्राथमिक स्तर पर ही साहित्य के प्रति लगाव उत्पन्न करना जरूरी होगा।
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कहा कि समाज का जो वर्ग हिंदी साहित्य को पढ़ता है, उसके सामने निरंतर रोजी-रोटी की समस्या बनी रहती है। कहा कि धनाढ्य वर्ग तो अंग्रेजी साहित्य को पढ़ने में अपनी ज्यादा रुचि दिखा रहा है। कहा कि साहित्य में ग्रामीणों, किसानों, मजदूरों, अन्य पिछड़े वर्गों के मुद्दों को प्रमुखता के साथ उठाया जाना जरूरी है।

साथ ही श्रेष्ठ सृजन के साथ ही उसे पाठक तक पहुंचाना भी एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। दोनों कवियों का कहना था कि वर्तमान में पुस्तकालयों की हालत भी बेहद दयनीय हो चुकी है। पुस्तकालयों में मात्र पाठ्यपुस्तकें हैं। अन्य पठनीय पुस्तकों का अभाव हो गया है, जिसके चलते छात्र निरंतर पुस्तकालयों से मुंह मोड़ रहा है जो गंभीर चिंता का विषय है।

दोनों का मानना था कि हिंदी कविता ने हमेशा ही समाज के ज्वलंत मुद्दों को उठाने के साथ ही समाज को नई राह दिखाने में अहम भूमिका निभाई है।

.................फोटो सहित 20एनटीएल 10पी व 11पी से
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