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उतराखंड की हरियाली बढ़ाएगा बीज बम
Updated Sat, 11 Aug 2018 02:28 AM IST
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पेड़
हल्द्वानी। उत्तराखंड में हरियाली बढ़ाने के लिए ‘बीज बम’ का भी सहारा लिया जाएगा। इन बीजों बमों के जरिए खास तौर पर दुरूह जगहों पर हरियाली करने की योजना बनाई है, जहां पर सामान्य तौर पर पौधरोपण, बीज बुआई जैसी परंपरागत विधियों के माध्यम से हरियाली करना संभव नहीं होता है।
वन अनुसंधान केंद्र के प्रभारी रेंजर मदन बिष्ट के अनुसार हल्द्वानी ने बीज बमों से रानीखेत के दुर्गम जंगलों में और तराई केंद्रीय वन प्रभाग के भाखड़ा रेंज में हरियाली बढ़ाने की कोशिश की गई है। कितने बीज बम फेंके गए और कितने पौधे तैयार हए हैं, उनका डेटा बैंक भी तैयार किया जाएगा।
ऐसे बनता है बीज बम
वर्मी कंपोस्ट, मिट्टी को बराबर मात्रा में पानी में मिलाया जाता है। फिर इस पॉटिंग क्ले में लोई बना कर बीज रखा जाता है। फिर लोई का गोला बनाकर सुखाया जाता है। इस तरह बीज बम तैयार हो जाता है।
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इस तरह करता है काम
वनाधिकारियों के अनुसार मिट्टी, वर्मी कंपोस्ट से बना यह बम (गोला) नमी मिलते ही टूटने लगता है। गोले के अंदर रखे बीज को पनपने के लिए खाद, मिट्टी, पानी तीनों मिलते हैं, इससे बीज अंकुरित होकर पौधा बन जाता है। अभी बमों में जामुन, आम, नीम, कुसुम के बीजों का प्रयोग किया जा रहा है ताकि वन्यजीवों को जंगल में ही भोजन मिल सके। पश्चिमी वृत्त वन संरक्षक डॉ. पराग मधुकर धकाते के अनुसार करीब छह साल पहले नैनीताल वन प्रभाग में इसका प्रयोग पहाड़ की दरारों और दूसरे जगहों पर हरियाली बढ़ाने के लिए किया गया था, जिससे भूस्खलन रोकने में मदद मिल सके।
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वन अनुसंधान केंद्र के प्रभारी रेंजर मदन बिष्ट के अनुसार हल्द्वानी ने बीज बमों से रानीखेत के दुर्गम जंगलों में और तराई केंद्रीय वन प्रभाग के भाखड़ा रेंज में हरियाली बढ़ाने की कोशिश की गई है। कितने बीज बम फेंके गए और कितने पौधे तैयार हए हैं, उनका डेटा बैंक भी तैयार किया जाएगा।
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ऐसे बनता है बीज बम
वर्मी कंपोस्ट, मिट्टी को बराबर मात्रा में पानी में मिलाया जाता है। फिर इस पॉटिंग क्ले में लोई बना कर बीज रखा जाता है। फिर लोई का गोला बनाकर सुखाया जाता है। इस तरह बीज बम तैयार हो जाता है।
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इस तरह करता है काम
वनाधिकारियों के अनुसार मिट्टी, वर्मी कंपोस्ट से बना यह बम (गोला) नमी मिलते ही टूटने लगता है। गोले के अंदर रखे बीज को पनपने के लिए खाद, मिट्टी, पानी तीनों मिलते हैं, इससे बीज अंकुरित होकर पौधा बन जाता है। अभी बमों में जामुन, आम, नीम, कुसुम के बीजों का प्रयोग किया जा रहा है ताकि वन्यजीवों को जंगल में ही भोजन मिल सके। पश्चिमी वृत्त वन संरक्षक डॉ. पराग मधुकर धकाते के अनुसार करीब छह साल पहले नैनीताल वन प्रभाग में इसका प्रयोग पहाड़ की दरारों और दूसरे जगहों पर हरियाली बढ़ाने के लिए किया गया था, जिससे भूस्खलन रोकने में मदद मिल सके।